कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 830, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(१०)
मुलतानबोध
जुज्वको है गचै जायद इजतरार । कलको भी बेजुज्वके कबहो करार ॥ गो नहीं जाहिरका पैगामों सलाम । जुज्व कलमें है मगर पिनहाँ कलाम ॥ दिलको हरेकके खलिश है जो यहाँ । है अनासिरकी कशिशयह ऐ जवाँ ॥ जज्व अपने जुज्वको करते हैं कल । उस कशिशका है बदनमें शोरोगुल ॥ हरबशरको है जो दिलमें इजतराब । खींचती है उसको पिनहानीतनाब ॥ रिश्तए उलफसे रहता है बंधा । जुज्व अपने कुलके साथऐबाखुदा ॥ जुज्व तनको है जो कुलके साथरन्त । है कशिशसे उसकी तेरी अकलखब्बत ॥ अपनी गुलफतसे तुझे है यह गुमाँ । मुझको जोफे कलब और मादा है अयाँ ॥
बादशाह दिल भरके इब्राहीमको प्यार कर लेने पर जैसे ही गौर से उसकी ओर देखने लगा वैसे ही उसे अपनी लडकी की याद आयी । लडकी की याद आतेही उसकी सुरत बाद- शाह के सामने आ खड़ी हुई । अब बादशाह देखता है तो इब्रा- हीमकी और उसकी लडकी की शकल में बाल बराबर भी भेद नहीं है । कहते हैं कि, उस समय बादशाह इतना रोया कि, उसका चेहरा लाल हो गया और आगे के कपडे आँसू से भीग गये । फिर जब मन कुछ ठहरा तब बादशाहने मुल्लाजीसे पूछा कि,—यह लडका कहाँ रहता है ? इसका बाप कौन है ? यह