कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ८१ )
आता पठना जिसका खातिरमें पसन्द । उसको देता नकद औरों से दो चन्द ॥ देके जर उस्ताद को शाहे निकों । छुट्टी दिलवाता था फिर हर तिफलको ॥
अपने सदा की आदतके अनुसार बादशाहने मुकदंबके हर एक लडके का पठना सुना और सबको इनाम भी दिया । परन्तु जब इब्राहीम की बारी आयी तब उस छोटेसे बच्चे का शुद्ध शुद्ध पठना, उसकी अदब के साथ बात चीत और उसके रंग रूप को देखकर बादशाह एकदम आश्चर्य सागर में गोता खाने लगा । उसके हृदयमें उस बच्चे का इतना प्रेम प्रवाह उमड़ चला कि वह हैरतमें पड़ गया । आखिर अपने प्रेम प्रवाह को रोक नहीं सका एक दम इब्राहीम को गोदमें उठाकर प्यार करने लगा । यद्यपि बादशाही रोंब दाब से यह बात कदापि मुमकिन नहीं थी तथापि अन्तर्गत हृदयमें किसी अनजानी शक्तिने ऐसा काम किया कि बादशाह अपना पद एक दम भूल गया और इब्राहीम को उठाकर गले लगा लिया । इब्राहीम के हृदय में भी खून ने जोश मारा वह भी बादशाह के हृदय से चिपट गया । अब बादशाहके हृदय पर और भी बड़ा भारी प्रभाव पड़ा ।
जुज्वको है जुज्वसे पैवस्तगी । खून को है खून से दिलवस्तगी ॥ दाब शाही से यह विलकुल दूर था । लेकरह इस अमरमें मजबूर था ॥ दिलको अपने जब्रगो उसने किया । जोश उलफतपर न उससे रुकसका ॥