भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 828

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सुलतानबोध

उसका चित्त संसारसे उदास हुआ वह सदा दुर्वैश फकीर और ईश्वरके भक्तोंके संगमें रहने लगा । जहाँ किसी महात्माका समाचार पाता वहीं उनके दर्शनको चला जाता और अपनी शान्ति के लिये उनसे प्रार्थना करता । दूसरी आदत उसकी सदासे यह थी कि, जब कभी वह शहरमें निकलता तब मदरसे और मुकतबोंमें जाकर लड़कोंका पढ़ना सुनता और उन्हें मिठाई वगैरह देकर खुश करता और शिक्षकों को इनाम देकर लड़कोंको छुट्टी दिलाता । इसके अतिरिक्त एक संतने भी उसे कहा था कि, मुकतबके लड़कोंको खुश रखनेसे तेरी सुराद कभी न कभी पूरी होजायगी । सो एक दिन बादशाहकी सवारी संयोगसे उसी मुकतबके पाससे निकली जिसमें इब्राहीम अद्दम पढ़ते थे । जिस समय बादशाहकी सवारी मुकतबके पास पहुँची उस समय बादशाहके कानमें बहुत मीठा और रीतिके अनुसार कुरान पढ़ते हुए किसी बच्चेका शब्द सुनपडा । बादशाहने एकदम सवारी रोकली और कुछ देरतक वहाँ ही खड़ा खड़ा सुनता रहा । फिर तो उस शब्दपर इतना मोहित हुआ कि, सवारीसे उतरकर मुकतब में पहुँचा ।

गुजराउसमुकतबकेआगे नागहाँ । मसहफइब्राहीमपढताथाजहाँ ॥ बादशाहने जब सुनीउसकीसदा । दिलपैउसकेकछुअसरपैदाहुआ॥ करकेउजाअपनेउसघोडेकोखड़ा । पढना इब्राहीमका सुनतारहा ॥

मुखरिजै इलफ़ाज उसके महवशद ।

सुनके अश अश कर गया हर जीखरद॥

था हमेशासे तरीका शाहका ।

जिस जगह मुकतब सरेरह देखता ॥

सुनता पढना जाके हरेक तिफ्लका ।

करता फिर इन आम हरयकको अता ॥