कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
कर अह्मशाह को अपने पास रखना चाहा किन्तु उन्होंने एक भी नहीं माना आखिर मजबूरीसे बादशाहने उन्हें बिदा किया । अह्मशाह अपनी उसी कुटीमें जाकर रहने लगे जब उनका जी चाहता तब आकर अपने लड़के और स्त्रीको देख जाते । कहते हैं कि, जबतक जीते रहे तबतक उनकी यही रीति रही ।
बादशाहने अपने घर लाकर इब्राहीमको पढ़ाने के लिये अच्छे अच्छे शिक्षक सब प्रकार की विद्या और गुणसे पूर्ण देश देशसे बुलाकर रखा “होनहार विरवानके होत चीकने पात” के अनुसार इब्राहीमकी बुद्धि ऐसी तीव्र थी कि शिक्षक लोग यदि एक बात बतलाते तो इब्राहीम उससे दश अधिक निकालते इस प्रकार सदगुरु की कृपा द्वारा इब्राहीमने थोडे ही वर्षोंमें अनेक विद्या और कला कौशल तथा राजनीतिमें योग्यता प्राप्त कर ली । समय पाकर बादशाहने इब्राहीमको राज्य सिंहासन पर बैठाकर बलख का बादशाह बना दिया ।
नाना की गद्दी पर बैठकर इब्राहीम अब इब्राहीमशाह हुये । राज्यके कामको इस योग्यता से किया कि, शत्रु और राज्य के लालची दूसरे बादशाह लोगोंने स्वयं प्रशंसा करके उनसे दोस्ती कर ली ।
इस प्रकारसे रामराज्य सा राज्य करने पर भी इब्राहीमशाह को फकीरों दुवैशों की संगति का ऐसा चसका लगा था कि, दिन रातमें राजकाजसे जभी अवकाश मिलता तभी साधु सन्तों के पास पहुँचते । चाहे कितने ही दूर पर किसी अच्छे महात्मा के रहने का समाचार पाते जरूर वहाँ जाकर उनसे सतसंग करके लाभ उठाते । इसी प्रकार राज्य करते हुये कई वर्ष