कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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वार्ता ११
एकबार एक आदमी दसहजार अशरफियाँ लेकर आपके पास आया और उनको स्वीकार करानेके लिये हठ करने लगा। आपने उससे कहा कि, तू इस थोड़ेसे सोनेके बदले मेरी साधुता मोल लेके मुझे त्यागियोंकी जमाअतसे निकलवाना चाहता है ? इतना कहकर आप वहाँसे उठकर चले गये।
धन्य है इस त्यागको। आजकलके वैरागी भी अपनेको महान त्यागी मानते हुए भी एक एक पैसाके लिये संसारी तुच्छ जीवोंके पास दीनता करते और झूठी खुशामद किया करते हैं क्या कोई सच्चा विचारवान उन्हें वैरागी कह सकता है कदापि नहीं।
वार्ता १२
एक आदमी ने आपसे विनय किया कि, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिसपर अमल करके मैं सन्त पदवी को पा सकूँ। आपने उससे कहा-सन्त बनने के लिये सबसे पहली बात यह है कि, लोक और परलोक दोनोंसे चित्त उठा करके-वल साहबमें लगादे। साहब के सिवाय अपने हृदयसे दूसरा सब कुछ निकाल दे। दूसरे-हरामकी कमाई छोड़कर सुकृति कमाईसे उदर निर्वाह कर। क्योंकि जिसका आहार शुद्ध है उसका हृदय शुद्ध होता, और जिसका हृदय शुद्ध होता है, उसीके अन्तःकरणमें साहबका सच्चा प्रकाश प्रकट होता है जिसने अपना आहार शुद्ध किया है वह अवश्य अपने पदको पहुंचा है। तीर्थ व्रत और नाना प्रकारके ऊपरी तपस्यासे चित्त शुद्ध नहीं होता बरन आहार शुद्ध होनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।