कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
लगाया था उस समय मेरे हृदयमें मोहका संचार हो आया था तब परमात्माकी ओरसे आज्ञा हुई थी कि, ऐ इब्राहीम तू मेरे प्रेम और भक्तिका दम भरता है और स्नेह दूसरोंसे करता है । जिस बातके लिये शिष्योंको सबसे अलग रहनेको कहता है उसीको तू आप पकड़ता है । जब मैंने यह सुना तब मैंने आशीर्वाद किया कि, हे प्रभु मेरी रक्षा तेरे ही हाथमें है, यदि मेरे पुत्रका मोह सुझे तुझसे अलग करनेवाला है तो सुझे मृत्यु दे दे या उसीको । बस जो कुछ साहबने किया सब ठीक किया । इतना कहकर आप वहाँसे शिष्यों सहित उठकर चले गये बलखवाले लोग रोते पीटते लाशको दफन करनेके लिये ले गये *
वार्ता १०
एकवार हजरत इब्राहीम अल्लमके पास कोई आदमी एक हजार दिरम लाया और विनय पूर्वक प्रार्थना की कि आप इसे स्वीकार कर लीजिये आपने उससे कहा कि मैं मँगतोंसे कुछ नहीं लेता । उस आदमीने कहा मैं मँगता नहीं हूँ बल्कि बड़ा धनवान हूँ । तब आपने उससे पूछा कि, जितना तेरे पास है उससे अधिक मिलनेकी इच्छा तेरे हृदयमें है कि नहीं ? उसने कहा हाँ अधिक तो जरूर चाहता हूँ । तब आपने कहा कि, तब तो तू बड़ा भिखमैंगा है इसलिये मैं तुझसे कुछ नहीं ले सकता । मैं उसीसे लेता हूँ जो इतना पूरा है कि, कुछ नहीं चाहता ।
- वर्तमानके त्यागके अभिमानी साधु और महंतोंको विचार करना चाहिये क्यों कि, ये भी तो अपनेको मुलतान इब्राहीम अल्लमसे बढ़कर त्यागी बतलाते हैं ।