भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 861, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 861

बोधसागर

( १२१ )

लगी परन्तु जब वह लौटकर अपने स्थानपर आया और सुल- तान इब्राहीम अह्म साहेब के आचार विचार को अपने कर्तव्यों से मिलाने लगा तब उसे प्रत्यक्ष ज्ञात होगया कि, वह तो अपने उचित परिश्रम द्वारा अपनी संसार माया चलाते हैं और वह अपनी संसार यात्राके लिये नाना प्रकार के वेश और दम्भकी बातोंसे संसार को बहकाकर अपना नाम बढ़ाता है। जिन बातोंके भेदको वह स्वयम् नहीं जानता उसको जानने का डौल बनाकर लोगोंको ठगता और भ्रममें डालता है। इस प्रकार से बोध होते ही उसने पश्चात्ताप करके अपने सब स्वाँगों को तिल्लौजली देकर काल देशसे निकलने और सत्यराज्य में प्रवेश करनेके लिये सच्चे संतोंका संग करना आरम्भ किया।

वार्ता १४

एक दिन परिश्रम करने पर भी आपको भोजन नहीं मिला। आपने साहिब को धन्यवाद दिया। इसी प्रकार सात दिन तक आपको भोजन नहीं मिला और बराबर आप साहिब को धन्यवाद करते रहे। आठवें दिन निर्बलता बहुत बढ़ गयी तब आपके मनमें कुछ भोजन मिलने की इच्छा हुई। साहिब की कृपासे एक मनुष्य आकर खड़ा हुआ और विनय करने लगा कि, आप मेरे यहाँ भोजन करने चलिंये उसके प्रेम और भक्ति भावको देखकर आप उसके साथ गये जब आप उस आदमी के घर पर पहुँचे तब उसके अमीराना ठाट और मकानात के देखनेसे मालूम हुआ कि, कोई बड़ा धनी आदमी है। उसने आपको एक सजी हुई कोठरीमें ले जाकर बैठाया फिर वह आपके पैरों पर गिरकर विनय पूर्वक कहने लगा कि, मैं