कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १२१ )
लगी परन्तु जब वह लौटकर अपने स्थानपर आया और सुल- तान इब्राहीम अह्म साहेब के आचार विचार को अपने कर्तव्यों से मिलाने लगा तब उसे प्रत्यक्ष ज्ञात होगया कि, वह तो अपने उचित परिश्रम द्वारा अपनी संसार माया चलाते हैं और वह अपनी संसार यात्राके लिये नाना प्रकार के वेश और दम्भकी बातोंसे संसार को बहकाकर अपना नाम बढ़ाता है। जिन बातोंके भेदको वह स्वयम् नहीं जानता उसको जानने का डौल बनाकर लोगोंको ठगता और भ्रममें डालता है। इस प्रकार से बोध होते ही उसने पश्चात्ताप करके अपने सब स्वाँगों को तिल्लौजली देकर काल देशसे निकलने और सत्यराज्य में प्रवेश करनेके लिये सच्चे संतोंका संग करना आरम्भ किया।
वार्ता १४
एक दिन परिश्रम करने पर भी आपको भोजन नहीं मिला। आपने साहिब को धन्यवाद दिया। इसी प्रकार सात दिन तक आपको भोजन नहीं मिला और बराबर आप साहिब को धन्यवाद करते रहे। आठवें दिन निर्बलता बहुत बढ़ गयी तब आपके मनमें कुछ भोजन मिलने की इच्छा हुई। साहिब की कृपासे एक मनुष्य आकर खड़ा हुआ और विनय करने लगा कि, आप मेरे यहाँ भोजन करने चलिंये उसके प्रेम और भक्ति भावको देखकर आप उसके साथ गये जब आप उस आदमी के घर पर पहुँचे तब उसके अमीराना ठाट और मकानात के देखनेसे मालूम हुआ कि, कोई बड़ा धनी आदमी है। उसने आपको एक सजी हुई कोठरीमें ले जाकर बैठाया फिर वह आपके पैरों पर गिरकर विनय पूर्वक कहने लगा कि, मैं
( १२२ )
सुलतानबोध
आपका मोल लिया हुआ दास हूँ सो यह सब वैभव आपकी सेवा में अर्पण करता हूँ, इसे स्वीकार कीजिये । आपने उसी समय उससे कहा कि, आजसे मैं तुझे दासत्व से स्वतंत्र करता हूँ और यह सब माल असबाब भी तेरे ही को देता हूँ । इतना कहकर आप वहाँसे उठकर जंगल में चले आये और साहिबसे प्रार्थना करने लगे “हे प्रभु ! आजसे तेरे सिवाय दूसरा कुछ न चाहूँगा । तू तो टुकड़े रोटीके बदले संसार भरकी माया मेरे गले बाँधना चाहता है” । कहते हैं कि, आपने मनका दण्ड देनेके लिये कई दिनों तक और भी भोजन नहीं किया ।
सद्गुरु ने सबसे अधिक मनके ऊपर ही ध्यान रखने को बारंबार कहा है । यथा—
साखी—मनके मते न चालिये, छाड़ि जीवकी बानि । कतवारीके सूत ज्यों, अलटि अपूठा आन ॥ मनके मते न चालिये, मनका मता अनेक । जो मनपर असवार है, सो साधू कोइ एक ॥ चिंता चित विसारि कै, फिरी न बूझिये आन । इन्द्री पसारा मेटिये, सहज मिले भगवान् ॥ मनको मारो पटकिके, टूक टूक है जाय । टूटे पीछे फिर जुटे, बीच गाँठ रहि जाय ॥
मनका विशेष वर्णन मन बोध ग्रन्थमें देखनेसे मालूम होगा
वार्ता १५
सुलतान इब्राहीम अह्मसाहबको निद्रा नहीं आती थी । एक बार बहुतसे आदमियोंने मिलकर इस बातकी परीक्षा ली । आपने पूछा कि, आपको निद्रा क्यों नहीं आती ? आपने उत्तर दिया जिस कालने बड़े बड़े ऋषि, सुनि, पीर, पैगम्बर
बोधसागर
( १२३ )
और औलियाओंको साहबसे विमुख कर दिया । वह सदा जाग कर सत्यपथके जीवोंको भटकानेकी युक्ति रचता रहता है, तब हमको सोनेकी फुरसत कैसे मिल सकती है ?
सच है । साहबने कहा है ।
काल खड़ा शिर ऊपरे, जागु बिराने मीत ।
जाको घर है गैल में, सो कस सोवै निर्वित ॥
वार्ता १६
एक बार सुलतान इब्राहीम अह्म साहब एक टूटे हुये मकानमें ठहरे हुए थे। उसमें और भी बहुतसे मुसाफिर उतरे थे। रातको ठंढी ठंढी हवा और साथ ही साथ पानीके छींटे भी पड़ने लगीं ।
उस मकानका द्वार टूटा हुआ था । इससे मकानके अन्दर ठंढी हवा और पानी आकर मुसाफिरोंको कष्ट पहुँचा रहे थे । आपसे उनका कष्ट देखा न गया । आप चुपचाप उठकर द्वार पर जाखड़े हुए । जिससे अन्दरके मुसाफिरोंको तो आराम हुआ किन्तु आप ठंडसे ठिठुर गये । सबेरा होनेपर लोगोंने देखकर पहचाना और आगसे सेकनेपर जब आपको होश आया, तब लोगोंने पूछा कि, आपने ऐसा क्यों किया ? तब आपने कहा कि, बहुत सी जानोंको बचानेके लिये एक का जान काममें आवे और बहुतोंकी तकलीफ दूर करनेके लिये एकको थोड़ी तकलीफ उठानी पड़े तो इससे बढ़कर अच्छा काम क्या होसकता है । इसलिये मैं द्वार पर खड़ा हो गया जिससे एक मेरी तकलीफ के बदले इतने मुसाफिरों को आराम होवे । सच है ।
दया भाव जाने नहीं, ज्ञान कथे बेहद ।
तेनर नरकै जायँगे, मुनि मुनि साखी शब्द ॥
( १२४ )
सुलतानबोध
वार्ता १७
सहलविन इब्राहीम नामक संतने कहा है कि एकबार वो सुलतान इब्राहीमके साथ सफर में थे, संयोगसे वो बीमार पड़ गये। सुलतानके पास जो कुछ बस्त्रादि था बेंचकर उनकी रक्षामें लगा दिया अन्तमें जब कोई सवारी भी नहीं रही तब सहलविन इब्राहीमने कहा “ मैं बहुत कमजोर हो गया हूँ अब आगे कैसे जासकूंगा ? ” आप उन्हें अपनी गर्दनपर बैठाकर तीन मंजिल-तक लेगये, जबतक वो अच्छे भी हो गये ❁
वार्ता १८
सुलतान इब्राहीम अद्भमके साथ जो कोई रहनेकी इच्छा प्रकट करता था। आप उससे तीन बचन ले लेते थे तब उसको अपने साथ रखते थे।
१ पहला नियम उनका यह था कि, आप किसीसे सेवा नहीं कराकर सबकी सेवा आप ही करते थे।
२ दूसरा नियम यह था कि, भजन करनेके समय का सबको सूचना देना अपने ऊपर रखवा था।
३ तीसरा नियम यह कि, मण्डली का कोई आदमी भी सुकृति की कमाई से जो कुछ कमा के लाता था उसको मण्डली में समान उपयोगमें लगाते थे।
इन नियमोंमें से एक भी नियम जिसको अस्वीकृत होता था उसको अपनी मण्डली से बाहर करदेते थे।
- नोट—धन्य है इस पर उपकारको। आजकलके साधुओंको ध्यान देकर इस बातको विचारना चाहिये क्यों कि, वर्तमान में साधुओंकी यह नीति हो गई है कि, सफर तो सफर किसी विशेष स्थान पर भी कोई बीमार पड़जाय तो उसे एक गिलास पानी तक देना बुरा समझते हैं। मैंने बहुतसे ऐसे दृष्टान्त देखे हैं और स्वयं भी उनके संग रहकर भोग लिया है।
बोधसागर
( १२५ )
आज कलके महंतोंको इस बात पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, वर्तमानके महंत या मण्डलीके मुखिया साथके साधुओंकी पूजा और भेंटको भी हड़प जाते हैं ।
वार्ता १९
एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्म साहबसे पूछा कि, आपका पेशा ( धन्धा ) क्या है ? आपने उत्तर दिया “मैंने संसारको तो उसके चाहने वालों पर छोड़ दिया है और परलोकको परलोकके चाहने वालोंके लिये । किन्तु अपने लिये मैंने केवल साहबका भजन रक्खा है । सच है साहबने कहा है ।
सार्वी-माला जपूं न कर जपूं, सुखसे कहूं न राम ।
मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ॥
वार्ता २०
एक बार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्मसे पूछा कि आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी । आपने उसे उत्तर दिया कि “एक बार मैंने एक दासको मोल लिया । जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नामसे आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें । फिर मैंने कहा तू करता क्या है ? उसने कहा जो आप हुकम देवें । फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा जो दास है उसको अपनी इच्छा कहाँ है ? जिसको अपनी इच्छा है वह दास ही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दासकी बातोंको सुनकर उसी दम उसको दासत्व से मोक्ष दे दिया
( १२६ )
सुलतानबोध
और उसीदम से अपना सब कुछ साहबको सौंप दिया । फिर जैसा वह चाहता है करता है । मैं न तो आधीनता करता हूँ न दासापन जो कुछ है साहबका है मेरा कुछ नहीं ।
नोट—वर्तमान कालके दास पदवी के अभिमानी कबीर पंथी साधुओंको उपर्युक्त सुलतान के दासके वचनों पर ध्यान देना चाहिये क्योंकि, यद्यपि आजकलके कबीरपंथी साधुओंके नाममें दास शब्द अवश्य जुटा होता है और उनके मनमें भी दास शब्दका बड़ा भारी अभिमान रहता है यहाँ तक कि, यदि किसी कबीर पंथीके नाममें दास शब्द न जुटा हो अथवा किसी का नामही ऐसा हो कि, उसके नामके साथ दास शब्दका जोड़ न मिलता हो तो उस दास शब्दसे हीन सच्चे दासको भी वचनों और व्यंग्योंके मारे तंग करते रहते हैं और बल पूर्वक उसके सुन्दर प्रसिद्ध नामको बिगाड़ने का प्रयत्न करते हैं और आप दास कहलाकर भी स्वामीपनके ऐसे दम्भ और अहंकार में पड़े रहते हैं कि, अपने गुरु (जैसे माता पिता, दीक्षा गुरु आदि) से भी मान चाहते और उनसे अपना पग पुजवाते हैं । और सतगुरुके वचनका ध्यान भी नहीं रखते क्यों कि, सतगुरुका वचन है ।
गुरुको नीचा करि जानई, गुरु से चाहे मान । सो नर नरके जायगा, जन्म जन्म होय स्वान ॥ दासापन तो हृदय नहीं, नाम धरावै दास । पानीके पीये बिना, कैसे मिटै पियास ॥ नाम धरावै दास जो, दासापन हो लीन । कहै कबीर लौलीन बिनु, स्वान बुद्धि कहि दीन ॥ दासापन हृदय बसे, साधन सों आधीन ।
बोधसागर
( १२७ )
कहै कबीरा दास सो, दास लक्ष लौलीन ॥ स्वामी होना सोहरा, दोहरा होनादास । गाड़र आनी ऊनको, बांधी चरै कपास ॥ निर्वन्धन बन्धा रहै, बन्धा निर्वंध होय । कर्म करै कर्ता नहीं, दास कहावै सोय ॥
वार्ता २१
एक ने आपसे एकदिन प्रार्थना की कि, आप मुझे उपदेश दीजिये । आपने उसको कहा कि, एक साहिब को याद रख और संसार को भूल जा । एक दूसरेने भी आपसे उपदेश मांगा आपने उसे कहा कि, बन्धे को खोल और खुलेको बांध । उस आदमीने कहा मैंने इसका अर्थ नहीं समझा । तब आपने उसको समझाया कि, थैली का मुंह खोल अर्थात् जो कुछ तेरे पास है उससे परमार्थ कर और-जबान को बांध अर्थात् बहुत बोलना छोडादे । सत्य है सत्य गुरुने कहा है ।
जिह्वाको दै बन्धनै, बहु बोलना निवार । सो परखीसे संग करु, गुरुमुख शब्द विचार ॥
इसी प्रकार से सुलतान इब्राहीम अद्वम साहब के विषयमें हजारों वार्ता प्रसिद्ध है । यहाँ ग्रन्थ बढ जानेके भयसे मेरे पास जितनी वार्ताओंका संग्रह है उन सबोंको नहीं लिख सकते । आपकी जीवनीके साथ अधिक लिखने का प्रयत्न किया जायगा ।
इति सुलतान इब्राहीम अद्वम साहबका संक्षिप्त
जीवन चरित्र समाप्तः
इति बोधसागर पूर्वार्द्ध समाप्तमिदं
प्रारंभिक पृष्ठ (समय खण्ड - बोधसागर)
श्रीः
कबीरसागर—
समय खण्ड—
बोधसागर
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराजा श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ७ कबीरसागर - १.
संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६
मूल्य : २०० रुपये मात्र ।
⊕ सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास TM
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०० ००४.
Printers & Publishers :
Khemraj Shrikrishnadass,
Prop: Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.
Web Site : http://www.Khe-shri.com
Email : khemraj@vsnl.com
Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013.
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or saint, wearing a crown and holding a small object, set against a light background.
श्रीमद्भगवद्गीता
निरञ्जनबोध (द्वादश तरंग)
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नाम की वंश व्यालीसकी दया.
अथ श्रीबोधसागरे
द्वादशस्तरंगः
श्रीग्रन्थ निरञ्जनबोध
★
ज्ञानी वचन चौपाई
काल निरंजन निर्गुणराई । तीन लोक जिह्वा फिरे दुहाई ॥ सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मांडा ॥ सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥ ब्रह्मा विष्णु और शिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
( ६ )
निरंजनबोध
चित्रगुप्त धर्म वरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥ चौरासी लाखअरुचारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥ पशु पक्षी जल थल विस्तारा । बन पर्वत जल जीव विचारा ॥ काल निरंजन सब पर छाया । पुर्ष नामको चिह्न मिटाया ॥ सत्तरयुग ऐसेहि चलि गयेऊ । पुर्ष शब्द एक चित्तमें ठयेऊ ॥
पुर्ष वचन
तबहीं पुर्ष ज्ञानी सों कहऊ । धर्मराय अति प्रबल जो भयऊ ॥ यह तो अंश भयावरियारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ॥ नाहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेहु छुडाई ॥
ज्ञानी वचन-साखी
दोहा—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज । जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुर्षको लाज ॥
चौपाई
मान सरोवर ज्ञानी आई । काल कठिन तब छेकी धाई ॥ काल कठिन गजें बहु वारा । मस्तिक साठ सूठ बरियारा ॥ सत्तर योजन गजें दंता । प्रलय जो कीन्हो काट अनंता ॥ कान एक आँखे चौरासी । औ मुख आठ हाथ लिये फाँसी ॥ छत्तिस नाम ताहि पुन जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥ तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीन लोक किये जेरी ॥ एक दंत पाताल चलावा । तहाँ जाय वासकको खावा ॥ दूजो दन्त पृथ्वी चलि आई । देव ऋषि जग दैत्यन खाई ॥ तीजो दंत गयो आकाशा । चन्द्र सूर्य खाये कैलासा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़त तहाँ आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥ लीन्हें खाय विष्णु को धाई । सकल खाय पुनि धूरि उडाई ॥ गजें दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥
बोधसागर
( ७ )
ज्ञानी वचन
ज्ञानी देखे दृष्टि पसारा । याते नाहिं बचे संसारा ॥ ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूहा काल खाइ दुनियाई ॥ निरञ्जन वचन-साखी
दोहा
जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार । तीन लोक पुर्षहि दिये, स्वर्ग पताल संसार ।
ज्ञानी वचन-साखी
चौपाई
बोले ज्ञानी शब्द अपारा । मोकहैं दीन्हा पुर्ष टकसारा ॥
साखी
मैं जो पठयो पुर्षको, करन हंसके काज । कालहि मार सिंगार हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
चौपाई
मारा काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करे पसारा ॥
निरञ्जन वचन
तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छुड़ाई ज्ञानी ॥ जगके माह कीन्ह हम बासा । पशु पक्षी जल थलमें आसा ॥ तीन सौ साठ पैठ हम लाई । तामें सकल जीव उरझाई ॥ जे दिनते हमने पैठ लगाई । दिन दिन उरझे सुझात नाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहैं मारी ॥ इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥ तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ शुभ अरु अशुभ दोहदल साजा । ऐसे अलख निरञ्जन राजा ॥
( ८ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
सत्त शब्द हम बोले बानी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥ गहे शब्द जब मन चित लाई । भाजे काल जीव लेव छुड़ाई ॥
काल वचन
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव वस हमरे ज्ञानी ॥ तीन सौ साठ पैठ उर्रेश । कैसे हंसन लेव उबेरा ॥ गङ्गा जमुना सरस्वती जानी । पुष्करगोदावरी कुछका मानी ॥ बद्री केदार हम का ठाऊं । जहाँ तहाँ हम तीर्थ लगाऊं ॥ मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥ सेतुबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय जम थाना ॥ हिंगलाज जिव जेहे सोई । कालका नगरकोठ महाँ होई ॥ गढ गिरना दत्तको थाना । ताहि घेर जम बैठ निदाना ॥ कमरू माह कमिशा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस देव मुक्ताई ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुडावहुँ आनी ॥ पुर्ष नामको कहुँ समभाई । जमराजा तव छोड पराई ॥ घाट बाट बैठे उर्रेश । हम शब्दतें होय निवेरा ॥ सुना रे काल दुष्ट अनयाई । शब्द संग हंसा घर जाई ॥
निरञ्जन वचन
का ज्ञानी दहो अधिकारा । हमरी नहिं छूटे जम जारा ॥ पांच पचीस तीन गुण आही । यह ले सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
बोधसागर
( ९ )
जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥ एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥ छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥
निरञ्जन वचन
हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥ इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥ का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥ साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥ कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥ अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥ जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥ पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥ पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥ शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥
निरञ्जन वचन
तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥ कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥ ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥ जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥ क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥
( १० )
निरंजनबोध
लोभी होय सर्प विकारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहदानी ॥ ज्ञानी करै करहु वरियारा । हमते कीन सकल निर्वारा ॥ जोई ज्ञान होय हमारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ तृष्णा लोभहिं देय बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥ उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥ नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत जस करो बड़ाई ॥ उनपै जम की परै न छाही । तासैं हंसा लोकहिं जाई ॥
निरंजन वचन
कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हों ज्ञान तुम्हारी बानी ॥ जुगत महातम सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥ तुम तो एक पन्थ प्रकासा । हम दशपन्थ काल जुगफांसा ॥ जगके जीव सबै भर्माऊँ । ज्ञानवंत को कर्म हटाऊँ ॥ मार जीव को करे अहारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ करे कर्म विषै बस भाई । चर वर्ण ले एक मिलाई ॥ कुलको त्याग होय सों न्यारा । चार वर्णको एक विचारा ॥ ज्ञान हमारा रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥ बेखबरन की करिहैं हांसी-ते जीवन पर हमारी फांसी ॥ फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥ कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥ निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥ हंस हमार शब्द अधिका । पुर्ष प्रताप को करे सम्हारा ॥
बोधसागर
( ११ )
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं घाई ॥ शब्द मान है शब्द सरूपा । निश्चै हंसा होय अनूपा ॥ उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चले विश्वासा ॥
निरञ्जन वचन
ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम साना ॥ इनको माने सब संसारा । कलि मे गंगा मुक्ती द्वारा ॥ देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृत कहैं विचारा ॥ यहीं विधि जग जीव बुलाई । जग मरन सब बंध बँधाई ॥ सूतक पातक वेद विचारा । परछ वेदमे करहि सम्भारा ॥ एकादशी मुक्ति की भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु काल ज्ञानका सन्धी । छोरों जीव सकलकी फंड़ी ॥ जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बर्त तप सबै नसावै ॥ वेद किताबकी छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विश्वासा ॥ ताके निकट काल नहिं आवे । निज बीरा जा सुर्त लगावे ॥ बीरा पाय भये वटपारा । शब्द सन्ध परखै बकसारा ॥ जोग बरत तपहुँ है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥ जेते हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरञ्जन वचन
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझौ सुरझौ नहिं जाई ॥ जो जीवनको भक्ति हटै हो । शब्द भेद तुम ताहि लखै हो ॥ पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै सो प्रानी ॥ शब्द पाय नहिं करै विचारा । कैसे पहुँचै लोक तुम्हारा ॥ शब्द पाय कर कर्म जगावै । कैसे ज्ञाना निज घर पावै ॥ शब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥
( १२ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥ हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥ काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥ शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥ बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥ आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥ पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
निरञ्जन वचन
निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥ कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥ तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥ कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥ हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥ ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥ खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥ हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥ पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥ तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥ हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥