भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १२५ )

आज कलके महंतोंको इस बात पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, वर्तमानके महंत या मण्डलीके मुखिया साथके साधुओंकी पूजा और भेंटको भी हड़प जाते हैं ।

वार्ता १९

एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्म साहबसे पूछा कि, आपका पेशा ( धन्धा ) क्या है ? आपने उत्तर दिया “मैंने संसारको तो उसके चाहने वालों पर छोड़ दिया है और परलोकको परलोकके चाहने वालोंके लिये । किन्तु अपने लिये मैंने केवल साहबका भजन रक्खा है । सच है साहबने कहा है ।

सार्वी-माला जपूं न कर जपूं, सुखसे कहूं न राम ।

मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ॥

वार्ता २०

एक बार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्मसे पूछा कि आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी । आपने उसे उत्तर दिया कि “एक बार मैंने एक दासको मोल लिया । जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नामसे आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें । फिर मैंने कहा तू करता क्या है ? उसने कहा जो आप हुकम देवें । फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा जो दास है उसको अपनी इच्छा कहाँ है ? जिसको अपनी इच्छा है वह दास ही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दासकी बातोंको सुनकर उसी दम उसको दासत्व से मोक्ष दे दिया