कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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आज कलके महंतोंको इस बात पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, वर्तमानके महंत या मण्डलीके मुखिया साथके साधुओंकी पूजा और भेंटको भी हड़प जाते हैं ।
वार्ता १९
एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्म साहबसे पूछा कि, आपका पेशा ( धन्धा ) क्या है ? आपने उत्तर दिया “मैंने संसारको तो उसके चाहने वालों पर छोड़ दिया है और परलोकको परलोकके चाहने वालोंके लिये । किन्तु अपने लिये मैंने केवल साहबका भजन रक्खा है । सच है साहबने कहा है ।
सार्वी-माला जपूं न कर जपूं, सुखसे कहूं न राम ।
मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ॥
वार्ता २०
एक बार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्मसे पूछा कि आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी । आपने उसे उत्तर दिया कि “एक बार मैंने एक दासको मोल लिया । जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नामसे आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें । फिर मैंने कहा तू करता क्या है ? उसने कहा जो आप हुकम देवें । फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा जो दास है उसको अपनी इच्छा कहाँ है ? जिसको अपनी इच्छा है वह दास ही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दासकी बातोंको सुनकर उसी दम उसको दासत्व से मोक्ष दे दिया