कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १२५ )
आज कलके महंतोंको इस बात पर ध्यान देना चाहिये क्यों कि, वर्तमानके महंत या मण्डलीके मुखिया साथके साधुओंकी पूजा और भेंटको भी हड़प जाते हैं ।
वार्ता १९
एकबार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्म साहबसे पूछा कि, आपका पेशा ( धन्धा ) क्या है ? आपने उत्तर दिया “मैंने संसारको तो उसके चाहने वालों पर छोड़ दिया है और परलोकको परलोकके चाहने वालोंके लिये । किन्तु अपने लिये मैंने केवल साहबका भजन रक्खा है । सच है साहबने कहा है ।
सार्वी-माला जपूं न कर जपूं, सुखसे कहूं न राम ।
मेरा हरी मोंको जपे, मैं पाऊं विश्राम ॥
वार्ता २०
एक बार किसीने सुलतान इब्राहीम अह्मसे पूछा कि आपने ऐसी अधीनता और दासापन कहाँसे सीखी । आपने उसे उत्तर दिया कि “एक बार मैंने एक दासको मोल लिया । जब उसे साथ लेकर अपने स्थान पर आया तो उससे पूछा कि, तेरा नाम क्या है ? उसने उत्तर दिया कि, जिस नामसे आप पुकारें वही मेरा नाम है । फिर मैंने पूछा तू खाता क्या है ? उसने कहा जो आप खिलावें । फिर मैंने पूछा कि, तू पहनता क्या है ? उसने जवाब दिया जो आप पहनावें । फिर मैंने कहा तू करता क्या है ? उसने कहा जो आप हुकम देवें । फिर मैंने कहा तू चाहता क्या है ? उसने कहा जो दास है उसको अपनी इच्छा कहाँ है ? जिसको अपनी इच्छा है वह दास ही नहीं है । आप फरमाते हैं कि, उस दासकी बातोंको सुनकर उसी दम उसको दासत्व से मोक्ष दे दिया
( १२६ )
सुलतानबोध
और उसीदम से अपना सब कुछ साहबको सौंप दिया । फिर जैसा वह चाहता है करता है । मैं न तो आधीनता करता हूँ न दासापन जो कुछ है साहबका है मेरा कुछ नहीं ।
नोट—वर्तमान कालके दास पदवी के अभिमानी कबीर पंथी साधुओंको उपर्युक्त सुलतान के दासके वचनों पर ध्यान देना चाहिये क्योंकि, यद्यपि आजकलके कबीरपंथी साधुओंके नाममें दास शब्द अवश्य जुटा होता है और उनके मनमें भी दास शब्दका बड़ा भारी अभिमान रहता है यहाँ तक कि, यदि किसी कबीर पंथीके नाममें दास शब्द न जुटा हो अथवा किसी का नामही ऐसा हो कि, उसके नामके साथ दास शब्दका जोड़ न मिलता हो तो उस दास शब्दसे हीन सच्चे दासको भी वचनों और व्यंग्योंके मारे तंग करते रहते हैं और बल पूर्वक उसके सुन्दर प्रसिद्ध नामको बिगाड़ने का प्रयत्न करते हैं और आप दास कहलाकर भी स्वामीपनके ऐसे दम्भ और अहंकार में पड़े रहते हैं कि, अपने गुरु (जैसे माता पिता, दीक्षा गुरु आदि) से भी मान चाहते और उनसे अपना पग पुजवाते हैं । और सतगुरुके वचनका ध्यान भी नहीं रखते क्यों कि, सतगुरुका वचन है ।
गुरुको नीचा करि जानई, गुरु से चाहे मान । सो नर नरके जायगा, जन्म जन्म होय स्वान ॥ दासापन तो हृदय नहीं, नाम धरावै दास । पानीके पीये बिना, कैसे मिटै पियास ॥ नाम धरावै दास जो, दासापन हो लीन । कहै कबीर लौलीन बिनु, स्वान बुद्धि कहि दीन ॥ दासापन हृदय बसे, साधन सों आधीन ।
बोधसागर
( १२७ )
कहै कबीरा दास सो, दास लक्ष लौलीन ॥ स्वामी होना सोहरा, दोहरा होनादास । गाड़र आनी ऊनको, बांधी चरै कपास ॥ निर्वन्धन बन्धा रहै, बन्धा निर्वंध होय । कर्म करै कर्ता नहीं, दास कहावै सोय ॥
वार्ता २१
एक ने आपसे एकदिन प्रार्थना की कि, आप मुझे उपदेश दीजिये । आपने उसको कहा कि, एक साहिब को याद रख और संसार को भूल जा । एक दूसरेने भी आपसे उपदेश मांगा आपने उसे कहा कि, बन्धे को खोल और खुलेको बांध । उस आदमीने कहा मैंने इसका अर्थ नहीं समझा । तब आपने उसको समझाया कि, थैली का मुंह खोल अर्थात् जो कुछ तेरे पास है उससे परमार्थ कर और-जबान को बांध अर्थात् बहुत बोलना छोडादे । सत्य है सत्य गुरुने कहा है ।
जिह्वाको दै बन्धनै, बहु बोलना निवार । सो परखीसे संग करु, गुरुमुख शब्द विचार ॥
इसी प्रकार से सुलतान इब्राहीम अद्वम साहब के विषयमें हजारों वार्ता प्रसिद्ध है । यहाँ ग्रन्थ बढ जानेके भयसे मेरे पास जितनी वार्ताओंका संग्रह है उन सबोंको नहीं लिख सकते । आपकी जीवनीके साथ अधिक लिखने का प्रयत्न किया जायगा ।
इति सुलतान इब्राहीम अद्वम साहबका संक्षिप्त
जीवन चरित्र समाप्तः
इति बोधसागर पूर्वार्द्ध समाप्तमिदं
प्रारंभिक पृष्ठ (समय खण्ड - बोधसागर)
श्रीः
कबीरसागर—
समय खण्ड—
बोधसागर
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
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अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ७ कबीरसागर - १.
संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६
मूल्य : २०० रुपये मात्र ।
⊕ सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or saint, wearing a crown and holding a small object, set against a light background.
श्रीमद्भगवद्गीता
निरञ्जनबोध (द्वादश तरंग)
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नाम की वंश व्यालीसकी दया.
अथ श्रीबोधसागरे
द्वादशस्तरंगः
श्रीग्रन्थ निरञ्जनबोध
★
ज्ञानी वचन चौपाई
काल निरंजन निर्गुणराई । तीन लोक जिह्वा फिरे दुहाई ॥ सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मांडा ॥ सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥ ब्रह्मा विष्णु और शिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
( ६ )
निरंजनबोध
चित्रगुप्त धर्म वरियारा । लिखनी लिखे सकल संसारा ॥ चौरासी लाखअरुचारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥ पशु पक्षी जल थल विस्तारा । बन पर्वत जल जीव विचारा ॥ काल निरंजन सब पर छाया । पुर्ष नामको चिह्न मिटाया ॥ सत्तरयुग ऐसेहि चलि गयेऊ । पुर्ष शब्द एक चित्तमें ठयेऊ ॥
पुर्ष वचन
तबहीं पुर्ष ज्ञानी सों कहऊ । धर्मराय अति प्रबल जो भयऊ ॥ यह तो अंश भयावरियारा । तीन लोक जीव कीन्ह अहारा ॥ नाहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेहु छुडाई ॥
ज्ञानी वचन-साखी
दोहा—करि प्रणाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज । जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुर्षको लाज ॥
चौपाई
मान सरोवर ज्ञानी आई । काल कठिन तब छेकी धाई ॥ काल कठिन गजें बहु वारा । मस्तिक साठ सूठ बरियारा ॥ सत्तर योजन गजें दंता । प्रलय जो कीन्हो काट अनंता ॥ कान एक आँखे चौरासी । औ मुख आठ हाथ लिये फाँसी ॥ छत्तिस नाम ताहि पुन जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥ तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीन लोक किये जेरी ॥ एक दंत पाताल चलावा । तहाँ जाय वासकको खावा ॥ दूजो दन्त पृथ्वी चलि आई । देव ऋषि जग दैत्यन खाई ॥ तीजो दंत गयो आकाशा । चन्द्र सूर्य खाये कैलासा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़त तहाँ आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥ लीन्हें खाय विष्णु को धाई । सकल खाय पुनि धूरि उडाई ॥ गजें दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥
बोधसागर
( ७ )
ज्ञानी वचन
ज्ञानी देखे दृष्टि पसारा । याते नाहिं बचे संसारा ॥ ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूहा काल खाइ दुनियाई ॥ निरञ्जन वचन-साखी
दोहा
जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार । तीन लोक पुर्षहि दिये, स्वर्ग पताल संसार ।
ज्ञानी वचन-साखी
चौपाई
बोले ज्ञानी शब्द अपारा । मोकहैं दीन्हा पुर्ष टकसारा ॥
साखी
मैं जो पठयो पुर्षको, करन हंसके काज । कालहि मार सिंगार हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
चौपाई
मारा काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करे पसारा ॥
निरञ्जन वचन
तबै निरञ्जन बोले बानी । कैसे हंस छुड़ाई ज्ञानी ॥ जगके माह कीन्ह हम बासा । पशु पक्षी जल थलमें आसा ॥ तीन सौ साठ पैठ हम लाई । तामें सकल जीव उरझाई ॥ जे दिनते हमने पैठ लगाई । दिन दिन उरझे सुझात नाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहैं मारी ॥ इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥ तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ शुभ अरु अशुभ दोहदल साजा । ऐसे अलख निरञ्जन राजा ॥
( ८ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
सत्त शब्द हम बोले बानी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥ गहे शब्द जब मन चित लाई । भाजे काल जीव लेव छुड़ाई ॥
काल वचन
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव वस हमरे ज्ञानी ॥ तीन सौ साठ पैठ उर्रेश । कैसे हंसन लेव उबेरा ॥ गङ्गा जमुना सरस्वती जानी । पुष्करगोदावरी कुछका मानी ॥ बद्री केदार हम का ठाऊं । जहाँ तहाँ हम तीर्थ लगाऊं ॥ मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥ सेतुबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय जम थाना ॥ हिंगलाज जिव जेहे सोई । कालका नगरकोठ महाँ होई ॥ गढ गिरना दत्तको थाना । ताहि घेर जम बैठ निदाना ॥ कमरू माह कमिशा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस देव मुक्ताई ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुडावहुँ आनी ॥ पुर्ष नामको कहुँ समभाई । जमराजा तव छोड पराई ॥ घाट बाट बैठे उर्रेश । हम शब्दतें होय निवेरा ॥ सुना रे काल दुष्ट अनयाई । शब्द संग हंसा घर जाई ॥
निरञ्जन वचन
का ज्ञानी दहो अधिकारा । हमरी नहिं छूटे जम जारा ॥ पांच पचीस तीन गुण आही । यह ले सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
बोधसागर
( ९ )
जहां तहां सब जग भर्मावै । ज्ञान संच कछु रहन न पावै ॥ एक शब्दकी केतक आसा । हमरे हैं चौरासी फांसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी शब्द विचारी । छूटै चौरासी की धारी ॥ छूटै पांच पच्चीस गुन तीनों । ऐसो शब्द पुर्ष सुहि दीन्हो ॥
निरञ्जन वचन
हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाह छूट जिव जाई ॥ इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥ का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक प्रलय तर डारा ॥ साधु सन्त हम देखी रीती । प्रलय परे सकल सब जीता ॥ कर्म रेख बाँधै सब साधा । सुरनरसुनि सकलो जग बांधा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । शब्द बिना तू खाय चबायी ॥ अब तुम कस खेहौ बटपारा । पुर्ष शब्द दीन्हौ टकसारा ॥ जनके जीवत लेउँ उबारा । कर्म रेख तोरो घर न्यारा ॥ पांच पच्चीस और गुन तीनों । इतने मोर हम लेउँ छीनो ॥ पांच जानेकी मेटी आसा । पुर्ष शब्द भाषौ विश्वासा ॥ शुभअरु अशुभ काकरे निबेरा । मेटी काल सकल उरझारा ॥
निरञ्जन वचन
तिगुन काल तब बोले बानी । उरझ जीव सकल जमखानी ॥ कै केसे तुम शब्द पसारो । कौनसी विधि तुम जीव उबारो ॥ ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी ॥ जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचै पुर्षके द्वारा ॥ क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरी है जन्म नर्कको खानी ॥
( १० )
निरंजनबोध
लोभी होय सर्प विकारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहदानी ॥ ज्ञानी करै करहु वरियारा । हमते कीन सकल निर्वारा ॥ जोई ज्ञान होय हमारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ तृष्णा लोभहिं देय बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥ उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥ नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा दूत जस करो बड़ाई ॥ उनपै जम की परै न छाही । तासैं हंसा लोकहिं जाई ॥
निरंजन वचन
कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हों ज्ञान तुम्हारी बानी ॥ जुगत महातम सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥ तुम तो एक पन्थ प्रकासा । हम दशपन्थ काल जुगफांसा ॥ जगके जीव सबै भर्माऊँ । ज्ञानवंत को कर्म हटाऊँ ॥ मार जीव को करे अहारा । काम क्रोध तैं होय नियारा ॥ करे कर्म विषै बस भाई । चर वर्ण ले एक मिलाई ॥ कुलको त्याग होय सों न्यारा । चार वर्णको एक विचारा ॥ ज्ञान हमारा रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥ बेखबरन की करिहैं हांसी-ते जीवन पर हमारी फांसी ॥ फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥ कैसे पहुँचै पुर्षके सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥ निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥ हंस हमार शब्द अधिका । पुर्ष प्रताप को करे सम्हारा ॥
बोधसागर
( ११ )
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं घाई ॥ शब्द मान है शब्द सरूपा । निश्चै हंसा होय अनूपा ॥ उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चले विश्वासा ॥
निरञ्जन वचन
ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम साना ॥ इनको माने सब संसारा । कलि मे गंगा मुक्ती द्वारा ॥ देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृत कहैं विचारा ॥ यहीं विधि जग जीव बुलाई । जग मरन सब बंध बँधाई ॥ सूतक पातक वेद विचारा । परछ वेदमे करहि सम्भारा ॥ एकादशी मुक्ति की भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु काल ज्ञानका सन्धी । छोरों जीव सकलकी फंड़ी ॥ जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बर्त तप सबै नसावै ॥ वेद किताबकी छोड़े आसा । हंसा करे शब्द विश्वासा ॥ ताके निकट काल नहिं आवे । निज बीरा जा सुर्त लगावे ॥ बीरा पाय भये वटपारा । शब्द सन्ध परखै बकसारा ॥ जोग बरत तपहुँ है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥ जेते हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरञ्जन वचन
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझौ सुरझौ नहिं जाई ॥ जो जीवनको भक्ति हटै हो । शब्द भेद तुम ताहि लखै हो ॥ पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै सो प्रानी ॥ शब्द पाय नहिं करै विचारा । कैसे पहुँचै लोक तुम्हारा ॥ शब्द पाय कर कर्म जगावै । कैसे ज्ञाना निज घर पावै ॥ शब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥
( १२ )
निरञ्जनबोध
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी बोले सुख बानी । सुनिये काल निरञ्जन आनी ॥ हंसा भक्ति जो करे हमारो । राखों सदा शब्द निज धारो ॥ काम कोध अहङ्कार बिकारा । इनको तजे है हंस हमारा ॥ शब्द हमार छोड़ै फन्द । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥ बीरा नाम पुर्ष को सारा । निर्मल हंस होय उजियारा ॥ आवागवन बहुरि नहिं होई । काल फांस तज न्यारा होई ॥ पहुँचे हंस पुर्ष दबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
निरञ्जन वचन
निरंजन बोले गर्भ सों भाई । मोर फंद टारे को जाई ॥ कर्म जंजीर बँधा संसारा । जो पुन हम जगजाल पसारा ॥ तीन लोग जो इन औतारा । आवागमनमें फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसे रहै भुलाई । देव ऋषी सुनि सकल जो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बडे जो ज्ञानी । बांध बांध कर तोपि समानी ॥ कर्म रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहों टूक जखीर तुम्हारा ॥ हंसन लेहों तुर्त उबारी । पुर्ष शब्द दीन्हों मोहे भारी ॥ ताहि डुकम सों मारों तोही । सब संसार तू खाया द्रोही ॥ खण्ड खण्ड कर तोरों बाना । मारों काल करो पिसमाना ॥ हंसन की मैं करों मुक्ताई । बहुरन जन्महि भौजल आई ॥ पुर्ष हंस नोतम है अंशा । ते जग प्रकट कहावै वंशा ॥ तिनके सरन हंस जो आई । कोट कर्म सब देयैं बहाई ॥ हंस संधि लखि होवैं न्यारा । चलतै पावे नहिं बटपारा ॥
बोधसागर
( १३ )
निरञ्जन वचन
मानों ज्ञानी वचन तुम्हारा । हंस ले जाव पुर्षे दर्बारा ॥ चौदह काल जगतमें म्हारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥ सुर नर सुनि आवैं वहि घाटा । दशहि और जो जोवे बाटा ॥ दुर्ग जगाती बड़ा सिरदारा । विना जगात कोइ उतरन पारा ॥ भोजन नदी घाट नहिं थाहू । उतरन काज कहै सब काहू ॥
ज्ञानी वचन
कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥ बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥ कोट सिद्ध तेज है हंसा । जब परवाना आवैं बंसा ॥ बंस छाप जब पावहिं प्राणी । ताहि न रोके दुर्गा रानी ॥ कहा काल तुम करो विचारा । हंस हमार उतरि है पारा ॥ सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़ि जायकाल मुखतोरी ॥ संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुवारा ॥
निरंजन वचन
तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बड़ाई ॥ पांव पताल शीश अकाशा । सोरह योजन अग्निप्रकाशा ॥ गजें काल महा विकरारा । सत्रह लाख लो पांव पसारा ॥ लपके जीभ जिमि टूटे तारा । जस बिजली चमके अँधियारा ॥ सृद्ध बदाय दंत अति बाढ़ा । मध्य घेर ज्ञानी कह ठाढ़ा ॥ हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी पुर्ष शब्द कियो जोरा । पकड़ सृद्ध दांत गहि मोरा ॥ मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सृद्ध समुद्र गहि मेली ॥ पुर्षरूप तबही पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥
( १४ )
निरञ्जनबोध
निरञ्जन वचन
भया अधीन दोड़कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥ तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोहि उद्धार ॥ बालक कोटि भांति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥ तुमहीं पुर्ष दीन मोहे राजू । औ पुनदीन्हसकलमोहिंसाजू ॥ तिहिं पर हमने गाउं बसावा । लीन्हे सुन्न ठिकान बनावा ॥ तहां हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहिं कराई ॥ अबलग साहब मैं नहिं चीन्हा । सत्त पुर्ष तुम दर्शन दीन्हा ॥ दोड़कर जोरि चरणचितलावा । धन्य भाग हम दर्शन पावा ॥ अब मोहिं साहब भेद बताई । पाऊं चिह्न हंस पहुँचाई ॥
ज्ञानी वचन
सुन रे काल निरंजन राई । पुर्ष नाम है वीरा भाई ॥ जो हंसा चित भक्ति समोई । ताको खूट गहे मत कोई ॥
साखी
जो निज वीरा पाय है, आवै लोग हमार । ताको खूण्ट गहो मत, सुनो काल बटपार ॥
निरञ्जन वचन
चौपाई
सुनो गुसाईं विनती मोरी । वीरा पाय करै कछु औरी ॥ ज्ञान कथै अन्त चित वासा । आवागमनकी राखों आसा ॥
ज्ञानी वचन
सुनी निरंजन वचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी
जा घरते जिव आइया, ताह सुध गई खोय । गोहराय कहों मैं जीवसों, जो शब्द पारखी होय ॥
बोधसागर
( १६ )
निरंजन वचन
चौपाई
कहै बाल तुम भली विचारी । संप देख हम कांथ उतारी ॥ उनके निकट दूत नहीं आई । साहब हंस देहों पहुँचाई ॥
साखी
साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ॥ लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥
ज्ञानी वचन साखी
जाहु काल घर आपने, शब्द कहौँ चितलाहु ॥ जो फिर सीस उठाय हो, बांध रसातल जाहु ॥
चौपाई
जो पुन गह्यो हंसकी बाँही । बांध रसातल पठाऊँ तोही ॥
निरंजन वचन
जब तुम रूप दिखावा मोहा । तब हम पुरुष चीन्हा तोही ॥ प्रथमै ज्ञानी हम नहीं जाना । बन्धु जानकान्हा अभिमाना ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब सों हम आये । गढ़ रैदास मो धारा पाये ॥ प्रथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द्र भये तहाँ राई ॥ तहाँ जाय शब्द गुहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥ सतयुग सत्त नाम मोरो नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥
धर्मदाससों वचन
धर्मदास सुनि टेके पाई । तुव प्रनाप सकल सुधि आई ॥ काल चरित्र सकल हम जाना । पुर्ष लीला सबही पहुँचाना ॥ जब आपुन आये भौमाहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥
इति श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त
ज्ञानबोध (त्रयोदश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
त्रयोदशस्तरंगः
ग्रन्थ ज्ञानबोध
★
कबीर वचन
साखी-सत गुरु जीव प्रबोधके, नाम लखावै सार । सार शब्द जो कोई गहे, सोई उतरि है पार ॥
चौपाई
भौसागर है अगम अपारा । तामें बूड गया संसारा ॥ पार लगन को सब कोइ धावे । बिना नाम कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे । बिना सतगुरु सब गोता खावे ॥ जग जीवों से कहो गुहराई । सतगुरु केवट पार लगाई ॥ यह जग बूड गयो मैझधारा । सतगुरु भक्त भये भवपारा ॥ सत्तनाम जो करे पुकारा । जब भव जल उतरेंगे पारा ॥ सत्तपुरुष है अगम अपारा । ताको सब मैं कहीं विचारा ॥ आदि अनाम ब्रह्म है न्यारा । निराधार मई कियो पसारा ॥ ताहि पुरुष सुमरो रे भाई । तन छोड़ जिवलोक सिधार्ह ॥ कहे कबीर नाम गह सोई । भरम छोड़ भव पारहिं होई ॥
साखी
आदिब्रह्म हिय परखिय, छोड़ो मरन अजान । कहे कबीर जग जीवसे, गहिले पद निरवान ॥