कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
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और औलियाओंको साहबसे विमुख कर दिया । वह सदा जाग कर सत्यपथके जीवोंको भटकानेकी युक्ति रचता रहता है, तब हमको सोनेकी फुरसत कैसे मिल सकती है ?
सच है । साहबने कहा है ।
काल खड़ा शिर ऊपरे, जागु बिराने मीत ।
जाको घर है गैल में, सो कस सोवै निर्वित ॥
वार्ता १६
एक बार सुलतान इब्राहीम अह्म साहब एक टूटे हुये मकानमें ठहरे हुए थे। उसमें और भी बहुतसे मुसाफिर उतरे थे। रातको ठंढी ठंढी हवा और साथ ही साथ पानीके छींटे भी पड़ने लगीं ।
उस मकानका द्वार टूटा हुआ था । इससे मकानके अन्दर ठंढी हवा और पानी आकर मुसाफिरोंको कष्ट पहुँचा रहे थे । आपसे उनका कष्ट देखा न गया । आप चुपचाप उठकर द्वार पर जाखड़े हुए । जिससे अन्दरके मुसाफिरोंको तो आराम हुआ किन्तु आप ठंडसे ठिठुर गये । सबेरा होनेपर लोगोंने देखकर पहचाना और आगसे सेकनेपर जब आपको होश आया, तब लोगोंने पूछा कि, आपने ऐसा क्यों किया ? तब आपने कहा कि, बहुत सी जानोंको बचानेके लिये एक का जान काममें आवे और बहुतोंकी तकलीफ दूर करनेके लिये एकको थोड़ी तकलीफ उठानी पड़े तो इससे बढ़कर अच्छा काम क्या होसकता है । इसलिये मैं द्वार पर खड़ा हो गया जिससे एक मेरी तकलीफ के बदले इतने मुसाफिरों को आराम होवे । सच है ।
दया भाव जाने नहीं, ज्ञान कथे बेहद ।
तेनर नरकै जायँगे, मुनि मुनि साखी शब्द ॥