कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ३९ )
निरभय ज्ञान कहो जिवपासा । जो कोह होय तुम्हारा दासा ॥ मूरखके तुम पास न जइयो । बचन हमारो हियमें गहियो ॥ मूरख ज्ञान कहो मत भाई । नाहक ज्ञान गांठको जाई ॥ डुरमति मन जाही कर भाई । तासे राखो भेद छिपाई ॥ ज्ञानी जनको नाम सुनावो । परम पुरुषसों हृदय चिन्हाओ ॥ साखी-मूरखसे ना खोलिहौ कहैं कबीर विचार । ज्ञानीसे न डुरायहौ, सुनो सत् मतसार ॥
चौपाई
अलख नाम घट भीतर देखो । हृदये माहीं करो विवेको ॥ घट घट राम बसे हैं भाई । विना ज्ञान नहिं देत दिखाई ॥ अतुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥ आतमराम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥ हिये नयनसे देखो भाई । जब तुमको वह राम दिखाई ॥ सब घट व्यापक सबसे न्यारा । सोई राम है जीव मँझारा ॥ अकह नाम कहा नहिं जाई । घट घट व्याप्त निरंतर आई ॥ आतमराम देख जिव पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥ जहाँ देखा तहाँ आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥ यही मता हम तुमकह दीन्हा । दूसर कोउ न पावै चीन्हा ॥ ऐसा ज्ञान लखाओ भाई । जो नहिं मानकाल तिहिं खाई ॥
साखी-अजर पुरुष एकै रहै, अजर लोक अस्थान ।
कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुषको जान ॥
सोरठा-सुनहु ज्ञानी धर्मदास, सोइ ज्ञान जप ऊपजै ।
एक नाम विश्वास, प्रगट ब्रह्म स्वरूप है ॥
चौपाई
आदि नाम जो राखे आसा । तापै परे न कालकी फाँसा ॥ आदि नाम निरअक्षर भाई । ताहि नाम ले लोकहि जाई ॥