कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 908, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४० )
ज्ञानबोध
सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥ आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥ तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥ सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥ सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥ जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥ जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥ लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥ तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥ सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥ धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥
सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।
कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥
धर्मदास-वचन चौपाई
कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥ अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥ आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥ आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥ अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥ अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥ सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥ सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥
सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।
अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥