कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 948, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८० )
मुक्तिबोध
चीठी उतरे दूरसौं, ताके सिर वैराग । नाम गहे पुरुष पावहीं, तब गुरु प्रगटे भाग ॥
चौपाई
पावे वस्तु मगन होय रहई । चढ़े ना उतरे लाख जौं कहई ॥ होय निशंक नहिं चित्त डुलावे । जो जेहि सुर्त धरे सो पावे ॥ अकह अमान पुरुष है सोई । तन धरि प्रगटे पुरुष न होई ॥ मूल वस्तु पावे बड़ भागी । देखिये साखी पदमें नागी ॥ कहि न जाय अकह को देखा । गुरुकी दया सुर्त सो पेखा ॥ साखीपद के तहां न काजा । आप मिले सोइ सेश विराजा ॥ अनुभव शब्द जहाँ ठहराना । को कह सके न जाय बखाना ॥ देख परख आवे परतीती । तब जैहै चौरासी जीती ॥ तहां नहीं तुम दुतिया भाऊ । आप मेड़ तबही सब गाऊ ॥ वहां बैठ अमृत फल पाऊ । जब निःशंक बहुर नहिं आऊ ॥ गुरु के शब्द हृदय मो आना । तानरकी भइ मुक्ति निज जाना ॥ कोटि असुर की राई आवे । हृद विश्वास सन्त जेहि पावे ॥ कहैं कबीर है शब्द सुहेला । गुरु पूरा सूरा होय चेला ॥ साखी-गुरु पूरा शिष्य सूरा, बाग मोरि रन पैठ । सन्तमुक्त कहैं चीन्हके, तब तखत पर बैठ ॥
इति मुक्तिबोध समाप्त