भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ८३ )

तेज तत्त्वपर सूर्य सवारा । भीतर बाहर सोग अपारा ॥ जब आकाशतत्त्व जो आवै । होइ भंग सब काज नशावै ॥ शुभहि अशुभ दोही निरतावै । मकर भेद छह मास बतावै ॥ पक्ष भेद कहऊँ अब सोई । अँधियारा पक्ष सूर्यको होई ॥

मकर संक्रांति

तेहि में सूर्य चन्द्रकी धारा । तीन तीन तिथि कीन्ह विचारा ॥ कहिँ अँधियारा कहिँ उजियारा । रवि शशि मंगलसूर्य सम्हारा ॥ चारि अंक गहि भेद विचारो । धरिकै कृष्णपक्ष निर्धारो ॥ फिर काया में बैठो जाई । काया सूर्य लहो निरताई ॥

साखी-काया सूरज जब उगै, होय पृथिवतत्त्व असवार ।

तबहि शुक्र शुभ जानिये, कारज शुभ सौवार ॥ अब मैं कहों चन्द्रकी धारा । कर्क संक्रांति छेमास विचारा ॥ तहां जब उदय चन्द्रको होई । अथवत सूर्य उगै पुनि सोई ॥ चलहि तत्त्वपै सूर्य सवारा । छेह मास आनन्द विचारा ॥ घरहि छाँड़ि जो बोलै आई । तो कारजसिद्ध होय नहिं भाई ॥ घरमें रहै तत्त्व नहिं होई । देश उपद्रव देखो सोई ॥ पृथ्वी तत्त्वपर चन्द्र सवारा । प्रेमानन्द और ज्ञान विचारा ॥ वायुतत्त्वपर चन्द्रकी धारा । किंचित कारज होय संचारा ॥ तेज तत्त्वपर चन्द्र जो आवै । पश्चिम दिशा कलह उपजावै ॥ आकाशतत्त्वपर चन्द्र सवारा । भीतर बाहर कष्ट अपारा ॥ पृथ्वीमें उदय चन्द्रको कहेऊ । शुक्लिहि पक्ष भेद अब रहेऊ ॥ दोई तिथी पक्ष उजियारा । तहांते केवल चन्द्रकी धारा ॥ तामें भेदाभेद विचारा । तीन तिथी चन्द्रसूर्य निर्धारा ॥ सोम शुक्र गुरु बुध जो होई । चन्द्र सनेह चारि दिन सोई ॥ रवि शनि मंगलवार विचारा । तीनहि दिनको सूर्य सिरदारा ॥