भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चौकास्वरोदय

सो स्वरूप हैं आदि निशानी । सत्यस्वरूप सो जीव समानी॥ प्रथमशब्दसुरतिसमृति निर्माया । जितने वेद और लोक बनाया॥ दुतिये इच्छा अंकुरकू कीन्हौ । उत्पतिप्रलयसौपि सब दीन्हौ॥ तृतिये माया मन विस्तारा । तिनके बीज जीव संचारा ॥ चौथे सुर चन्द्रहि परकाशा । शुक्ल भेद तिहिमाँहिनिवासा॥ पाँचयदिवशरातऔरतिथीपसारा । तापर सूर्य चन्द्रकी धारा ॥ एक नारि एक पुरुष कहावा । चन्द्र सूर्यनाम तिन पावा ॥

राखी-तिनको भेद शरीरमें बरतै, पाँच तत्व निजसार । कहैं कबीर सोई लख, पूर मिलै कडिहार ॥

चौपाई

काया भर्म भेद अधिकारा । नीर पवन दोह अस बैठारा ॥ नीर नामते उत्पति होई । नीरहि साथै मरै न कोई ॥ दुसरा पवन अंगकी धारा । तापर सोहैं सुरति बैठारा ॥ पवन भेद है अगम अपारा । आदि अन्त सब कीन्ह पसारा ॥ पवन डारि स्वासा अवगाहा । विन सदगुरु पावै नहि लाहा ॥ तापुर सूर्य चन्द्रकी धारा । सुखग चन्द्र औ सूर्यविचारा ॥ तिनकर भेद जो न्यारे करऊ । सूर्य चंद्र भेद दोई घरऊ ॥ दिनतिथिपक्षसंकांति विचारा । तापर पाँच तत्व विस्तारा ॥ सूर्य उदय संपूरण कहेऊ । भेद अभेद मर्म सब लयेऊ ॥ मंत्र उदौछे हि मासको भाजै । सूर्य सनेह सो तहां विराजै ॥ पृथ्वी तत्त्वपर सूर्य जो आवै । छै मासको शुभ दिखलावै ॥ घरको छाँड़ि तत्त्व जो बोले । प्रलय कालके छत्र जो डोले ॥ जलहि तत्त्वपर अस्थिर होई । ताको कष्ट होय नहि कोई ॥ वायु तत्त्व कीयो विस्तारा । किंचित कारज होय संसारा ॥