भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ८५ )

तिसरे समान ध्यान व्यवहारा । रिंजन वानीको करौ विचारा ॥ चौथे उद्याना ध्यानको लेखा । रिंजन वानिको करै विवेका ॥ पाँचई वानी सिंजन लेखा । विद्यान ध्यानसो किन्ह विवेका ॥

साखी-पाँच ध्यान पाँच बानी, पाँचे तत्व विचार ।

पाँच सुद्रा पाँच तत्व, पाँचे लग्न घरसार ॥

लग्न भेद

अब मैं कहों लग्न व्यवहारा । बार लगन कीन्है निरधारा ॥ तिनके लक्षण नाम सुनाऊं । चन्द्र सूर्यको प्रेम बताऊं ॥ कर्म करोर सूर्यके सोईं । शुभ के कर्म चन्द्रते होईं ॥ पाँचौ उदय सूर्य जब आवै । पृथ्वीतत्त्वपर जो घर पावै ॥ क्रूरकर्म सब सिद्ध निवासा । तहाँ चलि चौका भेद प्रकाशा ॥ मक्रहि उदय पक्ष अँघियारा । तिथि सनेह बीती नहिं वारा ॥ काया उदय सूर्य है सारा । पृथ्वीतत्त्व होय असवारा ॥ सोईं लग्न जसुनी है नामा । विगड़ै हंस पहुँचे निज धामा ॥ चन्द्रको वार सूर्य तिथि होईं । तांसो जगपति कहिये सोईं ॥ तन छूटे तहाँ जन्मुनि चहिये । और स्नेह जगपतिके कहिये ॥ ऐसे कर्म क्रूरके कहिये । जेतिक हंसके कारज कहिये ॥ बावड़ी विहार कूप तलाई । भोजन मिथुनहि युद्ध कराई ॥ इतने कर्म मैं तुम्हैं सुनाईं । और कर्म बहुतेरे भाईं ॥ संत साधुको एते कहिये । और कर्म अकर्म सब लहिये ॥ क्रूर कर्म हैं चौका सारा । मृतक कर्मको कीन्ह विचारा ॥ चारहुँ वेद भेद हम कहेऊ । सूर्य सनेह भेद निर्वेहेऊ ॥ जो कोई पिंड मायामें करही । सूर्य सनेह जीव उर धरही ॥ छुटे कर्म जन्म तहाँ धरहीं । दीन मान भोग तहाँ करहीं ॥ चन्द्र सनेह पिंड नहिं पावे । अमृत फिरै अरु काल सतावे ॥