भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८६ )

चौकास्वरोदय

कहाँ गया कहाँ नहीं गंगा । बिना सूर्य सब कारज भंगा ॥ जो कोई होय बहुत कडियारा । तुम सुनियो यह भेद विचारा ॥ इतने सूर्य लग्रके लच्छन । तत्त्व विचार सूर्य यह दीच्छन ॥

सारखी-तत्त्वभेद सब सूर्यको, सो मैं कह्यो बखान ।

कहै कबीर धर्मदास सुन, यह टकसार अमान ॥

, चन्द्रलग्र भेद

सूर्यभेद हम कह्यो विधाना । चन्द्रभेद अब कहाँ प्रमाना ॥ चन्द्रसनेह शुभकर्म विचारा । कर्कसंक्रांतिते चन्द्र निर्धारिा ॥ योगसिद्ध में भेद विचारा । उदयतत्त्व जल चलै मँझारा ॥ छहै मासको शुभ है सोई । इतनो भेद कर्कते होई ॥ पक्ष चन्द्रको है उजियारा । तापर केवल चंद्रकी धारा ॥ दोई तिथि चंद्र सूर्य समई । तीन चन्द्र तिथि सूर्य बताई ॥ चन्द्र सनेह जो वार है चारी । सोम शुक्र गुरु बुद्धि विचारी ॥ कायाचन्द्र जब उगे आई । तब सब उदय चंद्र घर पाई ॥ नाघट उदौ तो सर्व अभंगा । करत कार्य सब होई है भंगा ॥ जल तत्त्वपर चन्द्र असवारा । कार्य सिद्ध होई इसवारा ॥ पाँचों स्नेह चन्द्र घर आवे । तब पूनौ संपूरण पावे ॥ ताहि लग्रको प्रतिमा नाऊ । अखंडित चंद्र बरते सब ठाऊ ॥ ताहि लग्र सिख बोधौ जानी । चौकाविधि कीजे विलखानी ॥ सोई अंकुरि जो हंस हमारा । जिन यह स्नेह चौका विस्तारा ॥ सोई लग्र गहि नरियर मोरौ । जिमि कालसो तिनका तोरौ ॥ शुभकर्मके कहेउ परमाना । और कर्मके कहाँ विधाना ॥ प्रथममें चौका जग विस्तारा । दान पुण्य होम जग सारा ॥ वांग वृक्ष फूलहि फुलवारी । यहि मठ जात्रा सैन्य अचारी ॥ राजदर्शन बनिज व्यवहारा । स्नान ध्यान गुरुनेम अचारा ॥