भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १०८ )

कबीरबानी

मुक्ति सम्पूर्णन ॥ (पेडी) तहाँते चारी मुक्तिको जाना । तहाँते एक इण्ड परवाना ॥ तहाँते है इण्डको छौरा ॥

इण्डके आगे अनहद अँजोरा । आगे असंख्य शून्य विस्तारा ॥ तहाँ अचिंतनाम अंस करे व्यौहारा । अधर दीप है ताकर नामा प्रेम ध्यान ताकर विसरामा प्रेमसुरति नचि बारंबारा ॥ ताके सँग लखिबारहजारा ॥ १२००० ॥ तहाँ आगे सोहं अस्थाना । तहाँ तीन असंख बीच सून्य प्रमाना । तहाँते आठअंस उप- जाई उन्हे वंस अंसके स्थान बनाई ॥ तहाँ ओहं सोहं उजियारा । तिन संग हंस छतीस हजारा ॥ ३६००० ॥ ११ ॥ पेडी ॥ तेहि आगे मूलगति अस्थाना । तहाँ बीच सून्य आग असंख्य प्रमाना । हंसा तिन संग बावना हजारा ॥ ५२००० ॥ तिन्हते पांच ब्रह्म उपजारा ॥ पेडी ॥ १२ ॥ आगे सुरति मूल इच्छाको मूला । स्वाति सनेह जाको है स्थूला ॥ वीस सून्य चार असंख निरधारा । तिन संग हंस पचीस हजारा ॥ २५००० पेडी १३ ॥ तिनके आगे सुरति निशानी । सर्वोत्पत्तीकी रजधानी ॥ बीचशून्य दो असंख्य प्रमाना । तिन्ते भये अंकूर ठिकाना ॥ सोरा असंख्य तिन्हते विस्तारा । हंस तिन्हि संग पांच हजारा ॥ ५०००० ॥ धर्म- दास बचन सुन सांचे ! ताके संग हंस सब बांचे ॥ पेडी ॥ १४ ॥ तहाँ आगे अंकूरको प्रमाना । तिल प्रमान द्वार अनुमाना ॥ विहंग शब्दकी लागी डोरी । तेहि संग हंस गये पुरुषलगि सोरी ॥ पेडी ॥ १५ ॥ बीच अँधियारी घोर अपारा । एकअसंख्य दस- लाख विस्तारा ॥ १०००००००००० १०००००० ॥ आगे हमार निजलोक ठिकाना ॥ ताको मर्म काल नहिं जाना ॥ पेडी ॥ १६ ॥

सारखी—कहैं कबीर

इतना पांजी भेद है, धर्मनि सुनि चितलाइ । समरके प्रतापते सब, हंस लोके जाइ ॥