कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १०९ )
चौपाई
सोरा असंख्य उत्पत्ति पसारा । चार असंख्य शून्य विस्तारा ॥ सात शून्य दोउ बेशून्य कहावै । एकै शून्य कोई विरला पावै ॥ तहांते तीन शून्य भए प्रवाना । आदि अंश शून्य सुरत ठिकाना ॥ तिहिंते तीन भए परकारा । चार सुरतको सकल पसारा ॥ प्रथम शून्य लोकते लागी । तीनिसुरत भए शून्य अनुरागी ॥ आठ अंश अरु वंश पसारा । तहाँ लगि देखो शून्य विस्तारा ॥ इतना जीके होय निन्यारा । ताके आगे लोक हमारा ॥ हम चीन्है और गुरुको सेवै । कर्म तोड़ि के जुग जुग जावै ॥ लोक वेद कुल माया धारी । काल फंद यम फंद विचारी ॥ निसदिन सुरत सतगुरुसों लावै । साधु संतके चितहि समावै ॥ जनपर दाय़ा सतगुरु केरी । तिनकी कटै कर्मकी बेरी ॥ करनी कर अभिमान भुलाई । तब छूटै यम धरि ले आई ॥ करनी करिये गुरुके साथ । ताकु काल उठि नावै माथा ॥ करनी करी जो होय अधीना । ताको वासा लोकमें दीन्हा ॥ करनी करे निज सुतं लगावै । ताको सुकृत लोक पहुँचावै ॥ करनी करत कसरि होय आई । तबहि काल घर बाजु बंधाई ॥ सेवा करि राखे मन आसा । तन छूटै जीव परिहै सासा ॥ सद्गुरुसों अभिमान जो करिहै । तन छूटै जीव यमफंद परिहै ॥ बंस टेक औ नाम हमारा । पथ पूजा सद्गुरु कनहारा चारों अंश चिन्है जो पावै । तनमन धनसों प्रीति लगावै ॥ माता पिता बंधु सब भाई । पुत्री पुत्र हेतु लोलई ॥ घरकी घरणी पुरुष है सोई । इनकी प्रीति न कारज होई ॥ तासों काल रहै मुख गोई । नारी पुरुष सुरति कारज होई ॥