भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ११७ )

पाँचों सुत पाँचों अण्ड पाईं । दोईं अंश लै गुप्त बैठाईं ॥ अर्चित वृंद तब तिनहीं दियऊ । तिनको नाम अक्षर तिन ठयऊ ॥ पांच अंश नहीं पावत लेखा । और अंशको कहूँ विवेखा ॥ चार अंश अक्षर सेहेदानी । जिनते उपजी चारों खानी ॥ देखि अंश मोह तब आवा । दूसर अंश घट आय समावा ॥ त्रिगुण शक्ति घट गई समाईं । तब अक्षरको निद्रा आईं ॥ सोरा चौकड़ी सोये सिराईं । आठवो अंश जलमाँहि समाईं ॥ अंडजरूप जो जलमाँ दीन्ह। यह अविगति सब समरथ कीन्ह। अक्षर जग्यौ निद्रा गई भाई । देखि अंड व्याकुलता आईं ॥ तेहि अंडमें एक निशानी । सो अक्षर पाईं सहिदानी ॥ अक्षर दृष्टिसों अंड बिहराना । तिहिंते कैल भयो अभिमाना ॥ तिन्हके चार वेद भये बंशा । चौथे अंश कलानिधि तंसा ॥ मनमें अक्षर संख्या आईं । यह तो काल समर्थनिरमाईं ॥ तेहिंते शक्ति कीन्ह तिवाना । श्वाससुरति अन्तर बिलखाना ॥ आठों अंश घट रहे समाईं । स्वास संग घट बाहर आईं ॥ सोरा कला अष्टांगी अंगा । रूपकला वाही सब सुख संग। ॥ अक्षर कन्या दीन्ह पठाईं । तिनते तीन पुत्र भये भाईं ॥ अविगति गति काहु नहीं पावा । समरथ सत्य प्रपंच बनावा ॥

सारखी-कहे कबीर

इहविधि सब रचना करी, काहु न जाने भेद । जैसे है तैसे तब हती, अब कोकरै निखेद ॥

सारखी-अविगति निषेदकी-धर्मदास उवाच ।

धर्मदास बिनती अनुसारी । साहब बिनती सुनौ हमारी ॥ आठ अंशको भेद हम पावा । गति अवगति दूनों हम गावा ॥ चारि अंश एके मत ठाना । चारि अंश भिन्न भिन्न मत ठाना ॥