भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ११७ )

पाँचों सुत पाँचों अण्ड पाईं । दोईं अंश लै गुप्त बैठाईं ॥ अर्चित वृंद तब तिनहीं दियऊ । तिनको नाम अक्षर तिन ठयऊ ॥ पांच अंश नहीं पावत लेखा । और अंशको कहूँ विवेखा ॥ चार अंश अक्षर सेहेदानी । जिनते उपजी चारों खानी ॥ देखि अंश मोह तब आवा । दूसर अंश घट आय समावा ॥ त्रिगुण शक्ति घट गई समाईं । तब अक्षरको निद्रा आईं ॥ सोरा चौकड़ी सोये सिराईं । आठवो अंश जलमाँहि समाईं ॥ अंडजरूप जो जलमाँ दीन्ह। यह अविगति सब समरथ कीन्ह। अक्षर जग्यौ निद्रा गई भाई । देखि अंड व्याकुलता आईं ॥ तेहि अंडमें एक निशानी । सो अक्षर पाईं सहिदानी ॥ अक्षर दृष्टिसों अंड बिहराना । तिहिंते कैल भयो अभिमाना ॥ तिन्हके चार वेद भये बंशा । चौथे अंश कलानिधि तंसा ॥ मनमें अक्षर संख्या आईं । यह तो काल समर्थनिरमाईं ॥ तेहिंते शक्ति कीन्ह तिवाना । श्वाससुरति अन्तर बिलखाना ॥ आठों अंश घट रहे समाईं । स्वास संग घट बाहर आईं ॥ सोरा कला अष्टांगी अंगा । रूपकला वाही सब सुख संग। ॥ अक्षर कन्या दीन्ह पठाईं । तिनते तीन पुत्र भये भाईं ॥ अविगति गति काहु नहीं पावा । समरथ सत्य प्रपंच बनावा ॥

सारखी-कहे कबीर

इहविधि सब रचना करी, काहु न जाने भेद । जैसे है तैसे तब हती, अब कोकरै निखेद ॥

सारखी-अविगति निषेदकी-धर्मदास उवाच ।

धर्मदास बिनती अनुसारी । साहब बिनती सुनौ हमारी ॥ आठ अंशको भेद हम पावा । गति अवगति दूनों हम गावा ॥ चारि अंश एके मत ठाना । चारि अंश भिन्न भिन्न मत ठाना ॥

( ११८ )

कबीरबानी

तेहि कारण सबमोहि बतावहु । केहि कारण प्रपञ्च उर लावहु ॥

सारखी-चार सुरति सब मूल है, तुम समरथ परवान ।

तुमरे अंगते उपजि कहु, चारहुको अनुमान ॥

सारखी-बीजके कलसाकी-कीसा सतगुरु उवाच ।

धर्मदास मैं कहु न छिपाऊँ । तुमको सकलहि भेद बताऊँ ॥ प्रथमहि समरथ आप हते, दूसरो कोई न हुए । तब समरथके मुखते, सहजहि सुरति भये ॥ सोह सुरति स्वरूप धरि सहजहि बुन्ददयो । तेहिते सहजहि सुरतिका सहज अंकूर भयो ॥ तेहि अंकुरते सप्त करि भए ॥ दूसरे समर्थके अंशते क्षमास्वरूप सुरति भये ॥ तब स्वाती सरूप बूँद दियो जौन कारन सुनो ॥ जैसो सांचो तैसो स्वरूप जैसो घात तैसो अनूप ॥ एतो ठेका बँधे जब भयऊ इच्छासात । ७ ) अंड पांच ( २ ) चारी अंड एक सिद्धके ॥ ४ ॥ १ ॥ चारों स्वरूप भिन्न भिन्न हैं ॥ पांचो अण्ड प्रचण्ड भयो । दोउ करीमें अण्ड ना भयो ॥

ताहिकरीमें दो अंशहते । एक करीमें अक्षर हतो एक करीमें माया हती । एहि मता अवगति हतो । आगे तिसरी सुरतिको लेखासु- नो अविवगति सुरत अशून्य । तीसरी सुरतिका लेखा सो सुरति सखन उपजाई । तेहिको नाम मूल सुरति है ताह सुरतिको अंगल बूँद दीन्हाँ तेहि पांच ब्रह्म भये तिनको आज्ञा दर्ई एक एक ब्रह्म एक एक अंडन में आए, एते ब्रह्मते पांच अंश भये । तेही तत्त्वके घर भये । अण्ड फूटो पांच तत्त्व प्रगट भये । ६ । चौथी सुरती श्वासाते भये । ४ । तेहिको नामसोहं दियो । तेहिसोहंके ओहं बुद कन्हहाँ तेहिमें आठ अंस भये । सो एती रचना चारिकीरति कियो

बोधसागर

( ११९ )

प्रथम अंगते भए आगे सब निकास कई । सात इच्छा सातहीं अंश । अनइच्छाते आठों अंश भए । आठवाँ अंश भए । ते लोक भयो सर्व सृष्टिका संहार करे ।

बीजक सारकी साखी-कहैं कबीर ।

सात इच्छाके सात अंश भए, अपने अपने भाव ।

आठवा अंश विन इच्छा उपजै, ताको धर्म लखाव ॥

धर्मदास उवाच-एह धर्मदास ने पूछी ।

आहो साहेब काहेते समर्थ कहत हैं ? काहेते अचिन्त कहत हैं ॥ काहेते अक्षर कहत हैं ? काहेते जोगमाया कहत हैं ॥ काहेते कल कहत हैं ? इतना भेद कहो समुझाई ॥ भिन्न गुरु देह बताई । एहिकी शास्त्र गुरु कहैं ॥ सुनो धर्मदास तखतके धनी । तासो समर्थ कहत हैं ॥ तिनते आठ अंश भए । आठमें जेठ अचिन्त भये ॥ तिनके चिन्ता नाहीं । ताहिते अचिन्त कहाये ॥ तिनके प्रेम सुरति भई । तेहि प्रेममें अक्षर आनिसमानो ॥ तब मोह तत्व उपज्यो । तेहि मोहते चार अंश भए ॥ तेहिते चौरासी लक्ष्य जोनी भई । ८४००००० । तेहिते अक्षर ॥ कहाये । अब कैलकी हकी कत सुनो । तब अक्षरके मोहतत्त्व ॥ उपज्यो तेहि कारणते कैल भयो । मनसाते बुन्द पैदा कियो ॥ सो जहाँ अक्षर बैठो हतो । तहाँ जल तत्त्व हतो ॥ तेहि जलमें एक बुन्द आनिपडो । तेहि बुन्दते एते एक अंड भयो ॥ तब अक्षरने देखा उठिके । तब अण्ड लंगि आयो ॥ एक हकीकत लिखी हती । अंडके मुख ऊपर छाप हतो ॥ कहैं सृष्टिकी रचना करौ । और एक अंश हम पठायो है ॥ सो तुमते दूसरी करी है । सो तुम जिन पतियावो । जहाँ लंगि

( १२० )

कबीरबानी

आवै तहां लगि जिन रोको । आवने दीजो जिन काहु भेद ॥ बतावो । आगे सत्रासौ तीस हजारा युग कैल युगका प्रमाण है ॥ युग सो भुगति लेहे तेहि पीछे । हमारी आठै सुरती आई है ॥ तब हमारो महातम होई है । तब कालसों जीव छुड़ाई है ॥ तब कैलको महातम घटि जैहै । एती सनद अक्षर भेदकी ॥

साखी-कहैं कबीर

सात इच्छाके सात अंश भए, सातहि सुरति प्रकार । अन इच्छाते कैल भए, जीवको करै अहार ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

धर्मदास जिव शंका आई । उठि सदगुरुसों विनती लाई ॥ धन्य भाग्य मोहि मिले गुसाई । अपना करि मोहि लीन्ह मुक्ताई ॥ इच्छा सातके समरथ कर्ता । अत इच्छा वहां कहांते बरता ॥ सो निजु भेद बतावो मोही । इह सनद गुरु पूछौ तोही ॥ सात करी अंकुर बन्धाना । सात इच्छा तेहि माँहि समाना ॥ सात सुरतिमें थांका राखा । सात अंश तहां बोली भाखा ॥ आठवाँ अंश वह कहाते आवा । कौन भाँति वो अंश निमाँवा ॥

साखी-अविगति भेदकी धर्मदास पूछे ॥

अविगतिकी गति सब कहो, मैं बलिहारी जाऊँ । मेटि अँदेशा जीवका, पल पल परसो पाऊँ ॥

चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । वहिसमर्थ गति अजब तमासा ॥ इतना तत्त्व जिन पूछौ भाई । और सकल शब्द देहों बताई ॥ इच्छा सात शक्ति उत्पानी । स्वाति सनेह भए परमानी ॥ एक अंकुरते सब कछु कीन्हां । सब भण्डार तिहि माहे दीन्हां ॥ तिहि अंकुरकी सात भै करी । सात इच्छा तेहि माँहि लै धरी ॥

बोधसागर

( १२१ )

सेहजंकर तिह नाम कहाई । सात सुरैति तिहि मांहि रहाई॥ टेकाज्ञान कहतहों भाई । जेहि सुनि हंमा लोके जाई ॥ धर्मदास सुनिये चितलाई । यहि कलसा सब ज्ञानके भाई ॥ बीजक ज्ञान सब कहूँ निशानी । तेहिपर बीजक निश्चय ठानी ॥ सात करीके निर्णय सुनिहौ । बिना भेद तुम कछु न गुनिहौ ॥ भेदमें भेद हम राखौ गोई । सो पर सून्य लखो ना कोई ॥ इच्छा सीप स्वरूप उतपानी । सोवाती स्नेह भये परसानी ॥ बुंद एक आनंद स्वरूपी । इच्छा सात भये भिन्न स्वरूपी ॥ इच्छा सात रुचि अपने भाई । तेहि प्रमान बुंद तिन्ह पाई ॥ तेहिते पाँच अंड निर्माई । दोए करी तहाँ गुप्त छिपाई ॥ तेहिमें गुप्त अंश रहे वासा । प्रथम करीने बुंद निवासा ॥ तेज अण्ड तहाँ भयो प्रकाशा । तेहिमें सब है जीव निवासा ॥

इच्छाके नाम

मुख्य इच्छा तेहि इच्छाको नामा । आदि बुंद तिहि बुन्दको धामा ॥ दूसरी इच्छा नेत्र भरी हरे । सुकृत अण्ड भए तेहि केरे ॥ नेत्र इच्छाते नेत्र बुन्द पावा । तेहिमें सुकृत अंश निरमावा ॥ तिसरी इच्छा अविगत बानी । श्रवण इच्छामें आनि समानी ॥ श्रवन बुन्द अंश तिन्ह लीन्हा । अबोलनाम तेहि बुन्दको दीन्हा ॥ चौथे अण्डमें सत्य पसारा । चौथी इच्छा सो वास उच्चार ॥ स्वाती इच्छा तेहि करिको नामा । स्वाती बुन्द स्वाति सब धामा ॥ स्वतिते क्षमा अण्ड निरमाई । अण्ड पाँचमों कहुँ समुझाई ॥ पाँचही इच्छा निमिष ठेहेराई । करा एकमें जीवन पराई ॥ स्वाति प्रसन इच्छा उपजाई । जलहि अंड तहाँ उपज्यो भाई ॥ पाँच इच्छाके पाँच अण्ड निरमाई । दोये इच्छा वेही गुप्त रहाई ॥ छठि इच्छा है करता भाई । करति बुन्द तेहि मांहि समाई ॥

( १२२ )

कबीरबानी

सातें इच्छा सर्वत्र रहाई । सात बुन्द सब कला है भाई ॥ सातों इच्छा के करता अंकूला । सात करी सब दृष्टिको मूला ॥ तिनके सोरा अंश प्रमाना । एक वचनके सबही बंधाना ॥ आनंद बुन्द है सदा समीपा । तेहि अंकुरको भिन्न है दीपा ॥ एक सुरति एक अंकुर कहाई । तिहिको नाम सहजश्रुति भाई ॥ सात करी मो थाका बनाई । ताकी गतिमति काहु न पाई ॥ दो सुरति इच्छांकुर निर्माई । आठ इच्छा तेहि माँहि उपजाई ॥ सात इच्छा करि सात समानी । आठमी इच्छा काल उत्पानी ॥ तिसरी सुरति मूल प्रकाशा । मूलकीर्ति मूलअंकुर निवासा ॥ सुरतिमूल तिहि माँहि समानी । पांच ब्रह्म तहाँ भये उत्पानी ॥ सहजब्रह्मके पांचतत्त्व भये भाई । तरव सनेही सर्व उत्पन्न आई ॥ दुसरी इच्छा ब्रह्मको चीन्हा । सुकृत चिन्ह उत्पन्न कीन्हा ॥ तिसरो ब्रह्म मूल परवानी । मूल सुरति सब सृष्टि उत्पानी ॥ चौथे सोहं ब्रह्म कहावा । तेहि अण्डमों सर्व समावा ॥ पाँचों ब्रह्म जलाहल भयऊ । चौदह अंश गुप्त निर्मयऊ ॥ तीनि सुरतिकी एती रचना । चौथे सोहं कठे अमृत बचना ॥ सुरति अभयबुन्द तिन्ह पावा । तेहमें आठ अंस निरमावा ॥ चार गुप्त चार प्रगट पसारा । आपसहूपमिल आठों अमी अपारा ॥ तिनके भिन्न भिन्न परमाना । चार अंश भये सृष्टि बंधाना ॥ चार अंश भये मुक्त प्रमाना । तिन्हको भेद न काहु जाना ॥ अंशाहि अंश काहु नहीं देखा । शब्द स्वरूपी सबको पेखा ॥ तेहिके सनद अब कहां समुझाई । जेष्ठो अंश अचित्त है भाई ॥ तिनके प्रेम सुरति घट आई । तेहि प्रेममें मोह समाई ॥ तेहि मोहमें अक्षर उत्पानी । अक्षर जारि वेद सहेदानी ॥ अक्षर तेहि ते चारे भये दीपा । चार अंशने रहे समीपा ॥

बोधसागर

( १२३ )

चार अंश अक्षरते भयञ्ज । सर्वं सृष्टि भंडार ते ठयञ्ज ॥ प्रथम अंशते माया भयञ्ज । शुद्ध बीज पृथ्वी महँ ठयञ्ज ॥ दूसरे अदल अंश निर्माए । रसना सहस्र तिनते निरमाए ॥ तिसरे कुर्म भये अवतारा । जिनसर्वं पृथ्वीको लीनो भारा ॥ चौथे अंश भये धर्मराई । जिन्हें पाप पुण्यको लेखा पाई ॥ चार अंशको देखि भुलाना । तब अक्षर घटमाहिँ समाना ॥ तब समर्थ एक युक्ति बनाई । सातवाँ अंश तब आनि समाई ॥ तेहिंते निद्रा उपजी भाई । सत्तर निमिष युग गयो सिराई ॥ जब लगि निद्रा अक्षरकूँ आई । तब कछु दृश्य रहै ना भाई ॥ सब समर्थ मन शब्द उचारा । तेहिंमो कैल अण्ड भयो भारा ॥ तेहि अण्डमें उत्पति भूपा । नाम निरञ्जन ज्योति सरूपा ॥ तिनते तीन देव भए भाई । यहाँ सब लेहु लखि भाई ॥ सर्वं सृष्टि काल धरि खाई । काल देवको कोई न पाई ॥

साखी-टीकाका

सात सुरति तब मूल हैं, उत्पत्ति सकल पसार । अक्षरते सब सृष्टि भई, कालते भये तिछार ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सांचे सदगुरुकी बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥ और भेद सर्व हम पावा । आठमी इच्छा कीन्ह निर्मावा ॥ केहि कारणते इच्छा कहाई । अनइच्छा किमि कारण आई ॥ किमिकारणस्वरूपजोकालबनाई । यहाँ अविगति गति कहो समुझाई साखी-सत्य पुरुष तुम आदि हो, बोलो शब्द रसाल । अन इछाको मर्म कहां, जेहिंते उपज्यो काल ॥

( १२४ )

कबीरबानी

चौपाई-सदगुरु उवाच

कहे कबीरसुनो धर्मदासा । सत्य शब्द है हमरे पास॥ जेहिते बुद्ध होय सो इच्छा कहावै । जेहिते नास्ति होय ऐसी अनइच्छा कहावै॥ इच्छा अंकुरकी तन इच्छा हमारी । ते गुणकाल अंश अवतारी॥ बिना कालजीव नहीं डराई । तेहि वर काल रचाहम भाई॥ इच्छामें दया अंश है भाई । अनइच्छा निर्दया कहाई ॥ जीवन सुक्ति कहौ समुझाई । वचन न माने ताहि काल धरिखाई ॥

साखी-कालअंश क्या जन करौ, ताते जीव कालको खेले । ऐसेका खेले समान है, ज्यों तिछीमें तेल ॥

चौपाई-धर्मदास वचन

धर्मदास बहुते सुख पावा । उठि सतगुरुसों बिनती लावा॥ उत्पति कारण हम सब देखा । पांजी भेदका कहौ विवेका ॥ पांजी सुरति गुरु देहो लखाई । जेहि मारग हंसा चलि आई ॥ नामप्रताप कहौ समुझाई । जेहिके बल हंसा घर जाई ॥

साखी-धर्मदास विनती करै, जिवरा भयो अनंद ।

आप अपुनको लखि परचो, जब कटे कालको फन्द॥

चौपाई-सतगुरु कहै पांजी भेद

सुनो धर्मदास पांजी भेद प्रकासा॥ जिनसे सुनै है हंस निशवासा॥ पांजी तीन आश है ओगाहा । जो कोई जीव पहुँचे वाँहा ॥ प्रथम पांजी आश है भाई । तहाँ अग्रशब्द चढ़िलोक जाई ॥ सात शून्य दश लोक प्रमाना । अंश जो लोक लोकको शाना॥ नौ स्थान दशमो घर साँचा । तेहि चढ़ि गए जीव सब बाँचा॥ सोरा असंख्यपर लागी तारा । तेहि चढ़ि हंस गए लोक दरबारा॥ दूसरी पांजी लोक कहै भाई । तेहि पांजी त्री देव रहाई ॥ अष्टम दीप बावीसमें अकाशा । तहाँ विष्णु चलिगए तेहि पास॥

बोधसागर

( १२६ )

तिसरी पांजीका भेद अपारा । तुमसो धर्मनि कहों विचारा ॥ पाताल पांजी है जीव उबारा । भजन प्रतापसों उधरे दूबारा ॥ वाचा बंधको द्वार बनावा । तेहि पांजी गुरु भेद बतावा ॥ पांच भेद पाताल विनाशी । ताते काल करै नहिं हाशी ॥ तेहि पांजी जलरंग गुसाई । चौदह मुनि है तिनके ठाई ॥ जलरंग पासको भेजदो पावै । लोकै जात बार नहिं लावै ॥ सोरा लोक सोरा दरवाजा । सोरा अंश तेहि माँहि बिराजा ॥ सोरा अंश चिह्न जो पावै । जाके सद्गुरुनिज भेद लखावै ॥

साखी-तीनि पांजीके निर्णय, तुमसों कहो समुझाय ।

सार शब्द जो पाए तो, छिनमें हंस घर जाय ॥

धर्मदास पूछे मंत्र जो शुद्धा

सत्य सत्य मुख दयाजो कीजै । अपनोके मोहि निज कर लीजै ॥ तुम समर्थ गुरु जत्त के कर्ता । सकल भेद जो निर्णय वार्ता ॥ हम चीन्हा तुम बरन छिपाए । बरन छिपाये तुम जगमां आए ॥ आए तुम समर्थ हो अंतर्जानी । सत्य कहौ हम निश्चय मानी ॥ जो अपना कर जानो मोहीं । तो अपना तत्व बताओ सोहीं ॥ अब तुम कहो कैसे जग आये । कैसे तुम जोलहा कहाये ॥

साखी-एहि सब कारन भाखिहो, सब संशय मिटिजाय ।

अपनो कै प्रतिपाल हो, हंस लियो मुकताय ॥

चौपाई-सतगुरु खुदा होय प्रकटे साखी-खुदबानीकी सतगुरु बचन बिहँसिके बोले । सत्य सत्य तुम अन्तर खोले ॥ तुमसो अंतर कछू न राखों । सकल भेदकी निर्णय भाखों ॥ कहत बचन प्रतीत न आवै । तजत देह जीव ठौर न पावै ॥ तुम युग बंध होए कोई सेवकाई । तेहि पीछे हम भेद लखाई ॥ धर्मदास करनी निज करिहो । सीस उतार निज आगे धरिहो ॥

( १२६ )

कबीरबानी

बातो साटे वस्तु जो आई । तौ एको जीव विनशि नाजाई॥ चौका करिहो लेहो प्रवाना । तब पुनि कहूँ आप बंधाना ॥ तब नहीं हते खंड ब्रह्मंडा । तब नहीं नदी अठारह गण्डा ॥ तब नहीं सात सुरत उतपानी । तब नहीं कीन्ह सकल सहिदानी॥ तब नहीं कहते अंश और बंसा । तब नहिं कालत्रिगुणको संशा ॥ तब नहिं पांच अण्ड निर्माण । तब नहिं लोकहिं दीप बनाए ॥ अविगतिकी गति काहु न पाई । आप बरन हम रहे छिपाई ॥ तब हम हते हैता नहिं कोई । हमरे मांहे रहे सब सोई ॥ इस पारस सब सुर्त वट दीन्हा । एक बुन्दते सब कछु कीन्हा ॥ नाम बड़ाई अंशको दीन्हा । शुक्ल प्रकार रची हम लीन्हा॥ चारि सुरति हम प्रगट पसारा । पाँचवीं सुरतिहम गुप्त विचारा॥ तुम जिन शंका मानो भाई । हमते करता दूसरे न आई ॥ बरन छिपाय हम जगमें आये । युगन युगन हम जीव मुक्ताये ॥ चारों युग हम पंथ चलावा । सात सुरति काहु भेद न पावा॥ अब हम कीन्हा प्रगट पसारा । सातों सुरती पाय टकसारा ॥ आठे सुरति सुकृत अवसारा । ताते तुमते ज्ञान पसारा ॥ नौतम तरति घरमें राखी । तिनके भेद हम कबहूँ न भाखी॥ तुम बोधन हम जगमें आये । जाते काल तुम्हें भरमाये ॥ तब हम लोकते दीन्ह पियाना । तुमकारनहमअक्षय अछिपाना॥

मारग भेद सदगुरु कहे

प्रथम सहज सुरति लगि आए । नौतम सुरति हम नाम धराये॥ उन्हसों कहयोहमसत्य संदेशा । सहज अंकुर मानो उपदेशा ॥

सहज पूछ

तब उन पूछा तुमको आज । सत्य वचन तुम कहों कहाऊ ॥

बोधसागर

( १२७ )

सद्गुरु कहैं

तब मैं कह्यो मोर नाम कबीर । मैं समर्थ श्रुति नौतम शरीर ॥ पौन प्रवाना तुम लेहो भाई । समरथ हुकम लेहो शिर नाई ॥ प्रथम चौका सहज दीपमें कीन्हा । सहज सुरतिका अंकपर लीन्हा ॥ तब हम चले इच्छा सुरतिलाए । सत्य शब्द उन्हहीं समुझाए ॥ तौन अंकपर जीव चढ़ावा । मूल सुरतिके दीप चलि आवा ॥ सत्य शब्द तहाँ बोले बानी । मूल सुरतिसों निर्णय ठानी ॥

मूलसुरति पूछै

कहो तुम अस कहाँते आए । के तुम समरथ बरण छिपाए ॥

सद्गुरु कहैं

नाहम समरथसमरथनिशानी । नौतम सुरति पुरुषकी बानी ॥ जीवकाज संसार पठावा । तुमकोसिखाबनपुरुषकोआवा ॥ लेहु पान तुम तजो बड़ाई । पान लेख गुरु होवै सहाई ॥ मूल सुरति का चौका कीन्हा । चले सोहंग दीप पग दीन्हा ॥ तहाँ शब्द बोले निर्वाना । सत्य सन्देशै पुरुष प्रमाना ॥ चौथे चौका सोहंको कीन्हा । सोहं सुरत अंकेपर लीन्हा ॥ चौका चारि अधरपर कीन्हा । चले अचित दीप पग दीन्हा ॥ अचित अंश है रूप उजागर । मानि दीपमणिके आगर ॥ कंचन चरण भूमि उजियारी । मणि आगर मणीन विस्तारी ॥ वहाँ सत्य हम बोले बानी । अंश अचित करो पहिचानी ॥

अचित पूछो

पूछै अचित कहाँ आये । कौन चितावर इहाँ सिधाये ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कह्यो समर्थ पठावा । जीवकाजवरइहाँहमचलिआवा ॥ तुमते समरथ कह्यो सन्देशा । ज्ञान गम्य अरुवच उपदेशा ॥

( १२८ )

कबीरबानी

कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अचित लीन्हा परवाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥ तब आए अक्षर अस्थाना । महा शून्य माहे होत ठिकाना ॥

अक्षर पूछै

तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कह्यो मोहे समरथपठावा । जीवकाज इहाँ हम चलि आवा ॥ तुमते समरथ कह्यो संदेशा । ग्यानगम्य गुरु वचन उपदेशा ॥ कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अक्षर लीन्हा प्रमाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥

अक्षर पूछै

तब आए अक्षर अस्थाना । महाशून्यमाहे ताहि ठिकाना ॥ तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कही कहाँते आए । जिन एहि सब उत्पानि रचाये ॥ जिन इच्छापर मृष्टिरचि दीन्हा । छाप वचन कौल जिन्ह कीन्हा ॥

अक्षर उवाच

तब अक्षर घट कीन्ह विचारा । तुमतौ आपै सिरजन हारा ॥ इतना भेद हमीं पुनि जान्हा । सोइ निज भेद तुम कहेउ बखाना ॥ सोई छापकी कहाँ निशानी । तब हम जाने सत्तकी बानी ॥

सद्गुरु उवाच

सुनो अक्षर मैं कहूँ समुझाई । वस्तु सिखापन तुमको आई ॥ प्रथममें सृष्टि रचौ फुरमाई । दुसरे कालको लीन्ह बचाई ॥ तिसरे बचन दर्शनको कीन्हा । इतना वचन समर्थ तुम्हें दीन्हा ॥

बोधसागर

( १२९ )

अक्षर उवाच

तब अक्षर दोनों कर जोरी । तुम निश्चय जीवन बंध छोरी ॥ एक वचन मैं पूछो अर्थाई । तुम समर्थको अंश हो भाई ॥

सद्गुरु उवाच

तब अक्षरते कहो ससुझाई । कौल तुम्हारे देन हम आई ॥ तब दिलदया जीवनकी आई । वरणबोधकर छिपि जग आई ॥ समर्थस्वरूपसवजग शिर जाए । गुरुसरूप मुक्ता बनि आए ॥ बचन गहे सो उतरे पारा । बिना वचन डूबै संसारा ॥

अक्षर विनती करै

तब अक्षर निज विनती ठानी । समरथ देहो पान परवानी ॥ हम चीन्हा तुम पुरुषपुराना । जब आए तुम एहि ठिकाना ॥

सद्गुरु कहें

तब अक्षरका चौका कीन्हा । अक्षर सुरत अंकपर लीन्हा ॥ तब चलि दीप झंझरी आए । सत्य शब्द तहाँ बोल सुनाये ॥ गरजै झंझरी पग धरत न जाई । कैल पुरुष बैठो तिहिं ठाई ॥ दोह पालँग सुन्य है अंधारा । चारि कोटि ज्योति उजियारा ॥ झंझरी दीप हम गए मझारी । गर्भित कैल नहीं बिदै बिचारी ॥

निर्जर कहें

को तुम अज धरहोवरियारा । क्यों हम झंझरीमहँ पगधारा ॥ कौन हो अंश कहाँते आए । अपुनो नाम कहो ससुझाये ॥

सद्गुरु कहें

तब हम कही सुनोतुम बानी । योग जीत नाम मोर ज्ञानी ॥ समरथ मांग जीव मुक्तार्ई । तेहि कारण आए तुम्हरे ठाई ॥ इतना कहत कैल दुख पावा । कोधवंत होइ सन्मुख धावा ॥

( १३० )

कबीरबानी

कैल अनन्त भेष धरि लीन्हा । हम सन्मुख बहुयुद्धते कीन्हा ॥ गजसरूप होइ सन्मुख धावा । गही दंत चहुँ बाजु फिरावा ॥ तट फटकार लै पड़े सुंड डारा । भागे कैल तब पैठ पताला ॥ गयो पताल जहाँ कूर्म अवतारा । तब हम चाल तहाँ पग धारा ॥

कैल कहे

विनती करै कूर्म सों जाई । राखो कूर्म मैं तुम शरणाई ॥

कूर्म कहें

तबै कूर्म उठि विनती लाई । को तुम्ह आहु कहाँते आई ॥

सद्गुरु कहें

तब हम कह्यो नाम मोरा ज्ञानी । योग जीत हम अंश प्रमानी ॥ समरथ हुकम जीव उबरण आये । काल फांसते जीव सुत्ताये ॥ झँझरीमाहैं बहुयुद्ध हमसों कीन्हा । भागिके शरण तुम्हारी लीन्हा ॥ जो सिखवन समरथका लेहो । तो कैल हमार आगेकरि देहो ॥

कैल कहे

तबही कैल पुनिसन्मुख आये । आइ ज्ञानी सों वचन सुनाये ॥ सुनो ज्ञानी मोर वचन कोलेखा । अपने हृदय तुम करौ विवेका ॥ समरथ वचन दीन्ह मोहे हारी । मैं पायो लोक संसारी ॥ तबकी बात रहित भइ भाई । अब कसउटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुगते मध्यानी । हम पर कोप भये तुम ज्ञानी ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्हाँ । चौदह भवन बकस मोहिँ दीन्हाँ ॥ जैसी निर्णय हम सुनावो । तैसी सिखावन जानि चलावो ॥

कूर्म उवाच

कूर्म अंश तब बोले बानी । अपनी अपनी करो रजधानी ॥ इतना वचन सुनि लेहु हमारा । माहिँ माहिँ मतिकरो विगारा ॥

बोधसागर

( १३१ )

चौका पानको जीव तुम्हारा । लोक वेदको कैल पसारा ॥ जो कोई करै जोर बरियाई । ताको संग हम नहि है भाई ॥ तब ज्ञानी बहुते सुख पावा । कैल उलटि झँझरिसे आवा ॥

सद्गुरु उवाच

तब मैं धर्मनि संसारहि आवा । तीन देवसों टेर सुनावा ॥ एहि भूले माया अभिमाना । सत्य शब्द उनहु नहि जाना ॥ सुर नर सुनि कोई नहि माने । वेदहि किया सबै लपटाने ॥ युगन युगनमें शब्द पुकारा । जिन चिन्हें भए हंस हमारा ॥ बहुतेक हंस लोकको गयऊ । सत्य प्रती जाके धन भयऊ ॥ खोजत खोजत तुमपे आये । सर्व भँडार तुम्हें खोल बताए ॥ अब तुम कहा हमारो करहू । सोरा सतको चौका विस्तरहू ॥

साखी-सोरा सुतका चौका, एक अंग गुरु सिख होय ।

सदा हजुरी वे रहैं, मिले बिछुरे कोय ॥

सोरठा-जाने संत सुजान, बरंगीके रंगको ॥

समुन्दर बुन्द समान, मर्म कोइ जाने नहीं ॥

छन्द-ज्ञान प्रकासे दीपका, जुगति नाम जिन पाइया ।

सोइ दीप आदि साजिके, सोइ सुरु शीस चढ़ाई ॥

साखी-ब्रह्मज्ञानकी

अगम कोइ चीन्हें नहीं, लोभे ज्योति प्रकाश ।

रसवस जिव बांधे कालसों, फिरि फिरि बांधे आश ॥

चौकाविधि धर्मदास उवाच

धर्मदास तब सोंज मँगाये । कर जोरे उठि विनती लाये ॥

चौका जुगति बतावो सोही । पाँन प्रवाना देहो गुरु मोही ॥

सद्गुरु सम्मुख आसनकीन्हा । चौका पूरि प्रदक्षिण दीन्हा ॥

पान मिठाई नारियर सोपारी । लौंगएलची कपूर विचारी ॥

( १३२ )

कबीरबानी

नारियर मोरिके मालुम कीन्हा । समरथ भोग सुर्तसों लीन्हा ॥ लिखनी पान हाथके लेउ । सत्यके अंक पानपर देऊ ॥ तब यमपुरमें परचो खँबारा । सुत्तिके पंथ चल्यो संसारा ॥ अजरपान धर्मदासको दीन्हा । हंसरूप करि अपना लीन्हा ॥ अब तुम हमको चिन्हों भाई । गईतिमिर पिछली सुधि आई॥ पान प्रसाद सिखावन पावा । शीश उतारि ले चरण छुवावा ॥ धर्मदास तुम्हें सब विधि कीन्हा । माँगों वचन मैं सर्वस दीन्हा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारी । पायो बोल वचन मैं हारी ॥ मैं तरों और हमारी शाखा । और पीछले सबही पुरखा ॥

सद्गुरु उवाच

तब सतगुरु मनमें विहसाने । ते कहा माँग्योकछु माँगेनजाने ॥ सर्व सृष्टिको तारो भाई । तुम तो आपन वंश ठहराई ॥ एहि प्रपंच काल सब कीन्हा । मतिबुधि खैंचितुम्हारी लीन्हा ॥ तब धर्मदास जो भये मलीना । जैसे कँवलको संपुट दीन्हा ॥ तब सतगुरु फिर बोध विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ एक वस्तु गोय हम राखी । सो निर्णय नहीं तुमसों भाखी ॥ नौतन सुरति हमारी शाखा । सातसुरति जो उत्पति भाखा ॥ आठवीं सुरत तुमहि चलि आए । नौतम सुरति हम गुप्त छिपाए ॥ नौतम सुरति वचन निज मोरा । जेहिते पला न पकरै चोरा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास दोनों कर जोरा । कहो वचन सोई सद्गुरु मोरा ॥ सोई वचन कहौ समुझाई । जेहिते जीवन सृष्टि नहीं आई ॥

सद्गुरु उवाच

आठ बुन्दकी जुगति बनाई । नौतमते आठों बुन्द मुक्ताई ॥ बिना गुरु कोऊ भेद नहीं पावे । युग बँधे सो हंस कहावे ॥

बोधसागर

( १३३ )

तब युग बंध भये धर्मदासा । नौतम सुरतबुन्द परकासा ॥ नौतम अंश हिरम्म कीन्हा । आशिकबुन्दसावतिह दीन्हा ॥

धर्मदासकी विनती

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ नारायण दास हमारे सोई । उनकी सिखावन कैसी होई ॥ कैसी पंगति उनको करहू । अब तुम अपना वंश विस्तरहू ॥ दोह कैसे चलिहै रजधानी । सो सतगुरु मोहिं कहो बखानी ॥

सद्गुरु उवाच

तब सतगुरु एक वचन पुकारा । चूडामणि वंश छत्र उजियारा ॥ और सब बीज कील है भाई । तातेनारायणनामजीव कहाई ॥ चूरामणि नाम से काल डराई । नरनामको धरि धरि खाई ॥ अदली वंश चुरामणि सोई । बीज वंश निज हमते होई ॥ और सकल जगनाद सनेही । विन्द वंश पारसकी देही ॥ तिन्हके सनद चले संसारा । उनके हाथ मुक्ति टकसारा ॥ धर्मदास तुम नाद सनेही । तुम्हरे वंशाहि ब्यालिस देही ॥ मैं दीन्हों तुम लेन नहीं जाना । मुक्तिके वचन हम दीननिदाना ॥ वंश ब्यालिस बुन्द तुमारा । सो मैं एक वचनते तारा ॥ और वंश लघु जेते होई । बिना छाप नहीं छूटे कोई ॥ बिंद मिलै तो वंश कहावे । बिना वचन नहीं घर पावे ॥ नाद बिन्दु युग बन्ध जब होई । तबही काल रहै मुख गोई ॥ गर्भित नाद बचन नहीं मानै । ताते बिंद हम निर्णय ठानै ॥ बिंद एक नाद बहुताई । बिंद मिले सो बिंद कहाई ॥ मम स्रूप है बिंदके वंशा । तिन्हके सनद छूटे सब हंसा ॥

( १३४ )

कबीरबानी

सारखी-बंश थापे सो सार है, जो गुरु दिठकै देहि । सांचे दाव बतावही, जीव अपन करि लेहि ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ पंथ पंगती कैसे नीर बहाई । सो गुरु साँचे दया कराई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास मैं कहौ ससुझाई । हमही तुमहि कैसे बनि आई ॥ ऐसे नाद मिले बिंदको जाई । तबही हंस पहुचे वह ठाई ॥ अंश होइहैं उनके कडिहारा । तिनकी छाप चलै संसारा ॥ कोटिन योग युक्ति धरि धावै । विना बिंद नहिं घरको पावै ॥ हम बूंद तुम नाम प्रमाना । नारायण नाम नहिं ठिकाना ॥ वंश विरोध चलिहै पुनि आगै । काल दगा सब पंथहि लागै ॥

वंशप्रकार

प्रथम वंश उत्तम । १ । दूसरा वंश अहंकारी । २ । तीसरा वंश प्रचंड । ३ । चौथे वंश बीरहे । ४ । पाँचवें वंश निद्रा । ५ । छठे वंश उदास । ६ । सातवें वंश ज्ञानचतुराई । ७ । आठे द्वादश पन्थ विरोध । ८ । नौवें वंश पंथ पूजा । ९ । दसवें वंश प्रकाश । १० । ग्यारहवें वंश प्रकट पसारा । ११ । बारहवें वंश प्रगट होय उजियारा । १२ । तेरहवें वंश मिटे सकल औधियारा । १३ । एती दगा कालकी समाई है । तत्त्वबिन्दुकी टेक रह जाई है ॥

अगम बानी

अब तुम सुनो अगम्य की बानी । तुम पर कोपे काल अभिमानी ॥ चार सुरति काल की भाई । ताको काल पुनिकट बुलाई ॥ तुमसों मैं चार बानी भाषा । चारि निर्णयकी बोली भाषा ॥ तेहि पर काल करै चतुराई । चारों सुरति कहें संधि बताई ॥

बोधसागर

( १३५ )

कालकी चारसनंध

चितभंग जग कीन्ह प्रकाशा । बीजकसंधतिन्ह कीन्ह निवासा ॥ मन भंग लै मूल समाई । फैल जान बहुत चतुराई ॥ ज्ञान भंग है बड़ी अन्याई । सो टकसार भेद लै आई ॥ चौथे अकिल भंगको लेखा । वो तारतम लै करै विवेका ॥ छै दर्शन

आगे चारि संप्रदा भक्ति हृद्गई । सत्य पुरुषकी खबरि न पाई ॥ चारि पंथ आगम हम भाषा । ताके मैं न्हैचै तुम्हरी साखा ॥ ताते पंथ निनार हम राखा । सो सब तोसों दीनो भाषा ॥ बिंदु हमार चूरामणिदासा । उन्हके हाथे मुक्त निवासा ॥ उनके निकट काल नहि आवे । बचन वंश को शीश नवावे ॥

सारखी-चारि वानी चारि खानी, चारि ज्ञान निधान ॥

लाख चौरासी जिया जोनिनमें,तहां तीन जीवप्रमान॥

धर्मदास पूछे तीन जीव की सनद

धर्मदास पूछै चितलाई । तीन जीवन गुरु देहो बताई ॥

गुरु कहें तीन जीवन की परीक्षा

तब सद्गुरु बोले अस बानी । तीन जीवकीलखो सहेदानी ॥

तीन प्रकारके जीवबोधमें आई । चाल चले सो घरको जाई ॥

प्रथम जीव ब्रह्मसृष्टि है भाई । जिन्ह आवागमन रहितघरपाई ॥

दूसर जीव सृष्टि व्यवहारा । करनी करि लीन्है अवतारा ॥

तिसरी माया सृष्टि बन्धाना । बोध बचन कीनो परमाना ॥

अब तुम पंथ चलावो जाई । पढ़ुचे जीव तुम्हारी बाई ॥

प्रथम वानिसुनि सुरतिलगावे । निश्चय दर्श हमारा पावे ॥

प्रथम बानि है ज्ञान हमारा । सुनि हँस आवै सत्य दरबारा ॥

संमत पंद्रासे बीस प्रमाना । मास जेठ बरसायत जाना ॥

तेहिदिनकालिमोउतरेपुरमाना । वंश बयालिस रोपे थाना ॥

( १३६ )

कबीरबानी

चारि गुरु निज सीख हमारा । तिन्हकी छाप चले संसारा ॥ बंस बयालिस वचन हमारा । तिन्हते सुक्त होय संसारा ॥ सहसरभांति होम जोकोइ धावै । कोटिनयोग समाधि लगावै ॥ कोटिन ज्ञान छान बिल छाने । अर्थ परीक्षा बहुविधि आने ॥ वचन वंश को बीरा नहिं पावै । फिर मरे फिरहि गर्भमें आवै ॥ धर्मदास सुनो सत्य की बानी । काल प्रपंच बहुतविधि ठानी ॥

द्वादश पंथ चलो सो भेद

द्वादश पंथ काल फुरमाना । भूले जीव न जाय ठिकाना ॥ ताते आगम कहि हम राखा । वंश हमार चुरामणि शाखा ॥ प्रथम जगमें जागू भ्रमावै । विना भेद ओ ग्रन्थ चुरावै ॥ दुसरि सुरति गोपालहि होई । अक्षर जो जोग हढ़ावे सोई ॥ तिसरा मूल निरञ्जन बानी । लोकवेदकी निर्णय ठानी ॥ चौथे पंथ टकसारभेद लै आवै । नीर पवन को सन्धि बतावै ॥ सो ब्रह्म अभिमानी जानी । सो बहुत जीवनकीकरीहै हानी ॥ पांचौ पंथ बीज को लेखा । लोक प्रलोक कहें हममें देखा ॥ पांच तत्व का मर्म हढ़ावै । सो बीजक शुक्ल ले आवै ॥ छठवाँ पंथ सत्यनामि प्रकाशा । घटके माहीं मार्ग निवासा ॥ सातवाँ जीव पंथले बोले बानी । भयो प्रतीत मर्म नहिं जानी ॥ आठवे राम कबीर कहावै । सतगुरु भ्रमलै जीव हढ़ावै ॥ नौमे ज्ञानकी काल दिखावै । भई प्रतीत जीव सुख पावै ॥ दसवे भेद परमधाम की बानी । साख हमारी निर्णय ठानी ॥ साखी भाव प्रेम उपजावै । ब्रह्मज्ञानकी राह चलावै ॥ तिनमें वंश अंश अधिकारा । तिनमेंसो शब्द होय निरधारा ॥ संवत सत्रासै पचहत्तर होई । तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई ॥