भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १२७ )

सद्गुरु कहैं

तब मैं कह्यो मोर नाम कबीर । मैं समर्थ श्रुति नौतम शरीर ॥ पौन प्रवाना तुम लेहो भाई । समरथ हुकम लेहो शिर नाई ॥ प्रथम चौका सहज दीपमें कीन्हा । सहज सुरतिका अंकपर लीन्हा ॥ तब हम चले इच्छा सुरतिलाए । सत्य शब्द उन्हहीं समुझाए ॥ तौन अंकपर जीव चढ़ावा । मूल सुरतिके दीप चलि आवा ॥ सत्य शब्द तहाँ बोले बानी । मूल सुरतिसों निर्णय ठानी ॥

मूलसुरति पूछै

कहो तुम अस कहाँते आए । के तुम समरथ बरण छिपाए ॥

सद्गुरु कहैं

नाहम समरथसमरथनिशानी । नौतम सुरति पुरुषकी बानी ॥ जीवकाज संसार पठावा । तुमकोसिखाबनपुरुषकोआवा ॥ लेहु पान तुम तजो बड़ाई । पान लेख गुरु होवै सहाई ॥ मूल सुरति का चौका कीन्हा । चले सोहंग दीप पग दीन्हा ॥ तहाँ शब्द बोले निर्वाना । सत्य सन्देशै पुरुष प्रमाना ॥ चौथे चौका सोहंको कीन्हा । सोहं सुरत अंकेपर लीन्हा ॥ चौका चारि अधरपर कीन्हा । चले अचित दीप पग दीन्हा ॥ अचित अंश है रूप उजागर । मानि दीपमणिके आगर ॥ कंचन चरण भूमि उजियारी । मणि आगर मणीन विस्तारी ॥ वहाँ सत्य हम बोले बानी । अंश अचित करो पहिचानी ॥

अचित पूछो

पूछै अचित कहाँ आये । कौन चितावर इहाँ सिधाये ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कह्यो समर्थ पठावा । जीवकाजवरइहाँहमचलिआवा ॥ तुमते समरथ कह्यो सन्देशा । ज्ञान गम्य अरुवच उपदेशा ॥

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