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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( १२७ )

सद्गुरु कहैं

तब मैं कह्यो मोर नाम कबीर । मैं समर्थ श्रुति नौतम शरीर ॥ पौन प्रवाना तुम लेहो भाई । समरथ हुकम लेहो शिर नाई ॥ प्रथम चौका सहज दीपमें कीन्हा । सहज सुरतिका अंकपर लीन्हा ॥ तब हम चले इच्छा सुरतिलाए । सत्य शब्द उन्हहीं समुझाए ॥ तौन अंकपर जीव चढ़ावा । मूल सुरतिके दीप चलि आवा ॥ सत्य शब्द तहाँ बोले बानी । मूल सुरतिसों निर्णय ठानी ॥

मूलसुरति पूछै

कहो तुम अस कहाँते आए । के तुम समरथ बरण छिपाए ॥

सद्गुरु कहैं

नाहम समरथसमरथनिशानी । नौतम सुरति पुरुषकी बानी ॥ जीवकाज संसार पठावा । तुमकोसिखाबनपुरुषकोआवा ॥ लेहु पान तुम तजो बड़ाई । पान लेख गुरु होवै सहाई ॥ मूल सुरति का चौका कीन्हा । चले सोहंग दीप पग दीन्हा ॥ तहाँ शब्द बोले निर्वाना । सत्य सन्देशै पुरुष प्रमाना ॥ चौथे चौका सोहंको कीन्हा । सोहं सुरत अंकेपर लीन्हा ॥ चौका चारि अधरपर कीन्हा । चले अचित दीप पग दीन्हा ॥ अचित अंश है रूप उजागर । मानि दीपमणिके आगर ॥ कंचन चरण भूमि उजियारी । मणि आगर मणीन विस्तारी ॥ वहाँ सत्य हम बोले बानी । अंश अचित करो पहिचानी ॥

अचित पूछो

पूछै अचित कहाँ आये । कौन चितावर इहाँ सिधाये ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कह्यो समर्थ पठावा । जीवकाजवरइहाँहमचलिआवा ॥ तुमते समरथ कह्यो सन्देशा । ज्ञान गम्य अरुवच उपदेशा ॥

( १२८ )

कबीरबानी

कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अचित लीन्हा परवाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥ तब आए अक्षर अस्थाना । महा शून्य माहे होत ठिकाना ॥

अक्षर पूछै

तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कह्यो मोहे समरथपठावा । जीवकाज इहाँ हम चलि आवा ॥ तुमते समरथ कह्यो संदेशा । ग्यानगम्य गुरु वचन उपदेशा ॥ कौल पान दीन होए लेहौ । तन मन चित समर्थकूँ देहौ ॥ तब अक्षर लीन्हा प्रमाना । सत्य शब्द हिरदे हित माना ॥

अक्षर पूछै

तब आए अक्षर अस्थाना । महाशून्यमाहे ताहि ठिकाना ॥ तब अक्षर पूछै विहसाई । कौन अंश तुम कहाँ सिधार्द ॥

सद्गुरु कहैं

तब हम कही कहाँते आए । जिन एहि सब उत्पानि रचाये ॥ जिन इच्छापर मृष्टिरचि दीन्हा । छाप वचन कौल जिन्ह कीन्हा ॥

अक्षर उवाच

तब अक्षर घट कीन्ह विचारा । तुमतौ आपै सिरजन हारा ॥ इतना भेद हमीं पुनि जान्हा । सोइ निज भेद तुम कहेउ बखाना ॥ सोई छापकी कहाँ निशानी । तब हम जाने सत्तकी बानी ॥

सद्गुरु उवाच

सुनो अक्षर मैं कहूँ समुझाई । वस्तु सिखापन तुमको आई ॥ प्रथममें सृष्टि रचौ फुरमाई । दुसरे कालको लीन्ह बचाई ॥ तिसरे बचन दर्शनको कीन्हा । इतना वचन समर्थ तुम्हें दीन्हा ॥

बोधसागर

( १२९ )

अक्षर उवाच

तब अक्षर दोनों कर जोरी । तुम निश्चय जीवन बंध छोरी ॥ एक वचन मैं पूछो अर्थाई । तुम समर्थको अंश हो भाई ॥

सद्गुरु उवाच

तब अक्षरते कहो ससुझाई । कौल तुम्हारे देन हम आई ॥ तब दिलदया जीवनकी आई । वरणबोधकर छिपि जग आई ॥ समर्थस्वरूपसवजग शिर जाए । गुरुसरूप मुक्ता बनि आए ॥ बचन गहे सो उतरे पारा । बिना वचन डूबै संसारा ॥

अक्षर विनती करै

तब अक्षर निज विनती ठानी । समरथ देहो पान परवानी ॥ हम चीन्हा तुम पुरुषपुराना । जब आए तुम एहि ठिकाना ॥

सद्गुरु कहें

तब अक्षरका चौका कीन्हा । अक्षर सुरत अंकपर लीन्हा ॥ तब चलि दीप झंझरी आए । सत्य शब्द तहाँ बोल सुनाये ॥ गरजै झंझरी पग धरत न जाई । कैल पुरुष बैठो तिहिं ठाई ॥ दोह पालँग सुन्य है अंधारा । चारि कोटि ज्योति उजियारा ॥ झंझरी दीप हम गए मझारी । गर्भित कैल नहीं बिदै बिचारी ॥

निर्जर कहें

को तुम अज धरहोवरियारा । क्यों हम झंझरीमहँ पगधारा ॥ कौन हो अंश कहाँते आए । अपुनो नाम कहो ससुझाये ॥

सद्गुरु कहें

तब हम कही सुनोतुम बानी । योग जीत नाम मोर ज्ञानी ॥ समरथ मांग जीव मुक्तार्ई । तेहि कारण आए तुम्हरे ठाई ॥ इतना कहत कैल दुख पावा । कोधवंत होइ सन्मुख धावा ॥

( १३० )

कबीरबानी

कैल अनन्त भेष धरि लीन्हा । हम सन्मुख बहुयुद्धते कीन्हा ॥ गजसरूप होइ सन्मुख धावा । गही दंत चहुँ बाजु फिरावा ॥ तट फटकार लै पड़े सुंड डारा । भागे कैल तब पैठ पताला ॥ गयो पताल जहाँ कूर्म अवतारा । तब हम चाल तहाँ पग धारा ॥

कैल कहे

विनती करै कूर्म सों जाई । राखो कूर्म मैं तुम शरणाई ॥

कूर्म कहें

तबै कूर्म उठि विनती लाई । को तुम्ह आहु कहाँते आई ॥

सद्गुरु कहें

तब हम कह्यो नाम मोरा ज्ञानी । योग जीत हम अंश प्रमानी ॥ समरथ हुकम जीव उबरण आये । काल फांसते जीव सुत्ताये ॥ झँझरीमाहैं बहुयुद्ध हमसों कीन्हा । भागिके शरण तुम्हारी लीन्हा ॥ जो सिखवन समरथका लेहो । तो कैल हमार आगेकरि देहो ॥

कैल कहे

तबही कैल पुनिसन्मुख आये । आइ ज्ञानी सों वचन सुनाये ॥ सुनो ज्ञानी मोर वचन कोलेखा । अपने हृदय तुम करौ विवेका ॥ समरथ वचन दीन्ह मोहे हारी । मैं पायो लोक संसारी ॥ तबकी बात रहित भइ भाई । अब कसउटी अदल चलाई ॥ सबै अंश भुगते मध्यानी । हम पर कोप भये तुम ज्ञानी ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्हाँ । चौदह भवन बकस मोहिँ दीन्हाँ ॥ जैसी निर्णय हम सुनावो । तैसी सिखावन जानि चलावो ॥

कूर्म उवाच

कूर्म अंश तब बोले बानी । अपनी अपनी करो रजधानी ॥ इतना वचन सुनि लेहु हमारा । माहिँ माहिँ मतिकरो विगारा ॥

बोधसागर

( १३१ )

चौका पानको जीव तुम्हारा । लोक वेदको कैल पसारा ॥ जो कोई करै जोर बरियाई । ताको संग हम नहि है भाई ॥ तब ज्ञानी बहुते सुख पावा । कैल उलटि झँझरिसे आवा ॥

सद्गुरु उवाच

तब मैं धर्मनि संसारहि आवा । तीन देवसों टेर सुनावा ॥ एहि भूले माया अभिमाना । सत्य शब्द उनहु नहि जाना ॥ सुर नर सुनि कोई नहि माने । वेदहि किया सबै लपटाने ॥ युगन युगनमें शब्द पुकारा । जिन चिन्हें भए हंस हमारा ॥ बहुतेक हंस लोकको गयऊ । सत्य प्रती जाके धन भयऊ ॥ खोजत खोजत तुमपे आये । सर्व भँडार तुम्हें खोल बताए ॥ अब तुम कहा हमारो करहू । सोरा सतको चौका विस्तरहू ॥

साखी-सोरा सुतका चौका, एक अंग गुरु सिख होय ।

सदा हजुरी वे रहैं, मिले बिछुरे कोय ॥

सोरठा-जाने संत सुजान, बरंगीके रंगको ॥

समुन्दर बुन्द समान, मर्म कोइ जाने नहीं ॥

छन्द-ज्ञान प्रकासे दीपका, जुगति नाम जिन पाइया ।

सोइ दीप आदि साजिके, सोइ सुरु शीस चढ़ाई ॥

साखी-ब्रह्मज्ञानकी

अगम कोइ चीन्हें नहीं, लोभे ज्योति प्रकाश ।

रसवस जिव बांधे कालसों, फिरि फिरि बांधे आश ॥

चौकाविधि धर्मदास उवाच

धर्मदास तब सोंज मँगाये । कर जोरे उठि विनती लाये ॥

चौका जुगति बतावो सोही । पाँन प्रवाना देहो गुरु मोही ॥

सद्गुरु सम्मुख आसनकीन्हा । चौका पूरि प्रदक्षिण दीन्हा ॥

पान मिठाई नारियर सोपारी । लौंगएलची कपूर विचारी ॥

( १३२ )

कबीरबानी

नारियर मोरिके मालुम कीन्हा । समरथ भोग सुर्तसों लीन्हा ॥ लिखनी पान हाथके लेउ । सत्यके अंक पानपर देऊ ॥ तब यमपुरमें परचो खँबारा । सुत्तिके पंथ चल्यो संसारा ॥ अजरपान धर्मदासको दीन्हा । हंसरूप करि अपना लीन्हा ॥ अब तुम हमको चिन्हों भाई । गईतिमिर पिछली सुधि आई॥ पान प्रसाद सिखावन पावा । शीश उतारि ले चरण छुवावा ॥ धर्मदास तुम्हें सब विधि कीन्हा । माँगों वचन मैं सर्वस दीन्हा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारी । पायो बोल वचन मैं हारी ॥ मैं तरों और हमारी शाखा । और पीछले सबही पुरखा ॥

सद्गुरु उवाच

तब सतगुरु मनमें विहसाने । ते कहा माँग्योकछु माँगेनजाने ॥ सर्व सृष्टिको तारो भाई । तुम तो आपन वंश ठहराई ॥ एहि प्रपंच काल सब कीन्हा । मतिबुधि खैंचितुम्हारी लीन्हा ॥ तब धर्मदास जो भये मलीना । जैसे कँवलको संपुट दीन्हा ॥ तब सतगुरु फिर बोध विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ एक वस्तु गोय हम राखी । सो निर्णय नहीं तुमसों भाखी ॥ नौतन सुरति हमारी शाखा । सातसुरति जो उत्पति भाखा ॥ आठवीं सुरत तुमहि चलि आए । नौतम सुरति हम गुप्त छिपाए ॥ नौतम सुरति वचन निज मोरा । जेहिते पला न पकरै चोरा ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास दोनों कर जोरा । कहो वचन सोई सद्गुरु मोरा ॥ सोई वचन कहौ समुझाई । जेहिते जीवन सृष्टि नहीं आई ॥

सद्गुरु उवाच

आठ बुन्दकी जुगति बनाई । नौतमते आठों बुन्द मुक्ताई ॥ बिना गुरु कोऊ भेद नहीं पावे । युग बँधे सो हंस कहावे ॥

बोधसागर

( १३३ )

तब युग बंध भये धर्मदासा । नौतम सुरतबुन्द परकासा ॥ नौतम अंश हिरम्म कीन्हा । आशिकबुन्दसावतिह दीन्हा ॥

धर्मदासकी विनती

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ नारायण दास हमारे सोई । उनकी सिखावन कैसी होई ॥ कैसी पंगति उनको करहू । अब तुम अपना वंश विस्तरहू ॥ दोह कैसे चलिहै रजधानी । सो सतगुरु मोहिं कहो बखानी ॥

सद्गुरु उवाच

तब सतगुरु एक वचन पुकारा । चूडामणि वंश छत्र उजियारा ॥ और सब बीज कील है भाई । तातेनारायणनामजीव कहाई ॥ चूरामणि नाम से काल डराई । नरनामको धरि धरि खाई ॥ अदली वंश चुरामणि सोई । बीज वंश निज हमते होई ॥ और सकल जगनाद सनेही । विन्द वंश पारसकी देही ॥ तिन्हके सनद चले संसारा । उनके हाथ मुक्ति टकसारा ॥ धर्मदास तुम नाद सनेही । तुम्हरे वंशाहि ब्यालिस देही ॥ मैं दीन्हों तुम लेन नहीं जाना । मुक्तिके वचन हम दीननिदाना ॥ वंश ब्यालिस बुन्द तुमारा । सो मैं एक वचनते तारा ॥ और वंश लघु जेते होई । बिना छाप नहीं छूटे कोई ॥ बिंद मिलै तो वंश कहावे । बिना वचन नहीं घर पावे ॥ नाद बिन्दु युग बन्ध जब होई । तबही काल रहै मुख गोई ॥ गर्भित नाद बचन नहीं मानै । ताते बिंद हम निर्णय ठानै ॥ बिंद एक नाद बहुताई । बिंद मिले सो बिंद कहाई ॥ मम स्रूप है बिंदके वंशा । तिन्हके सनद छूटे सब हंसा ॥

( १३४ )

कबीरबानी

सारखी-बंश थापे सो सार है, जो गुरु दिठकै देहि । सांचे दाव बतावही, जीव अपन करि लेहि ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ पंथ पंगती कैसे नीर बहाई । सो गुरु साँचे दया कराई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास मैं कहौ ससुझाई । हमही तुमहि कैसे बनि आई ॥ ऐसे नाद मिले बिंदको जाई । तबही हंस पहुचे वह ठाई ॥ अंश होइहैं उनके कडिहारा । तिनकी छाप चलै संसारा ॥ कोटिन योग युक्ति धरि धावै । विना बिंद नहिं घरको पावै ॥ हम बूंद तुम नाम प्रमाना । नारायण नाम नहिं ठिकाना ॥ वंश विरोध चलिहै पुनि आगै । काल दगा सब पंथहि लागै ॥

वंशप्रकार

प्रथम वंश उत्तम । १ । दूसरा वंश अहंकारी । २ । तीसरा वंश प्रचंड । ३ । चौथे वंश बीरहे । ४ । पाँचवें वंश निद्रा । ५ । छठे वंश उदास । ६ । सातवें वंश ज्ञानचतुराई । ७ । आठे द्वादश पन्थ विरोध । ८ । नौवें वंश पंथ पूजा । ९ । दसवें वंश प्रकाश । १० । ग्यारहवें वंश प्रकट पसारा । ११ । बारहवें वंश प्रगट होय उजियारा । १२ । तेरहवें वंश मिटे सकल औधियारा । १३ । एती दगा कालकी समाई है । तत्त्वबिन्दुकी टेक रह जाई है ॥

अगम बानी

अब तुम सुनो अगम्य की बानी । तुम पर कोपे काल अभिमानी ॥ चार सुरति काल की भाई । ताको काल पुनिकट बुलाई ॥ तुमसों मैं चार बानी भाषा । चारि निर्णयकी बोली भाषा ॥ तेहि पर काल करै चतुराई । चारों सुरति कहें संधि बताई ॥

बोधसागर

( १३५ )

कालकी चारसनंध

चितभंग जग कीन्ह प्रकाशा । बीजकसंधतिन्ह कीन्ह निवासा ॥ मन भंग लै मूल समाई । फैल जान बहुत चतुराई ॥ ज्ञान भंग है बड़ी अन्याई । सो टकसार भेद लै आई ॥ चौथे अकिल भंगको लेखा । वो तारतम लै करै विवेका ॥ छै दर्शन

आगे चारि संप्रदा भक्ति हृद्गई । सत्य पुरुषकी खबरि न पाई ॥ चारि पंथ आगम हम भाषा । ताके मैं न्हैचै तुम्हरी साखा ॥ ताते पंथ निनार हम राखा । सो सब तोसों दीनो भाषा ॥ बिंदु हमार चूरामणिदासा । उन्हके हाथे मुक्त निवासा ॥ उनके निकट काल नहि आवे । बचन वंश को शीश नवावे ॥

सारखी-चारि वानी चारि खानी, चारि ज्ञान निधान ॥

लाख चौरासी जिया जोनिनमें,तहां तीन जीवप्रमान॥

धर्मदास पूछे तीन जीव की सनद

धर्मदास पूछै चितलाई । तीन जीवन गुरु देहो बताई ॥

गुरु कहें तीन जीवन की परीक्षा

तब सद्गुरु बोले अस बानी । तीन जीवकीलखो सहेदानी ॥

तीन प्रकारके जीवबोधमें आई । चाल चले सो घरको जाई ॥

प्रथम जीव ब्रह्मसृष्टि है भाई । जिन्ह आवागमन रहितघरपाई ॥

दूसर जीव सृष्टि व्यवहारा । करनी करि लीन्है अवतारा ॥

तिसरी माया सृष्टि बन्धाना । बोध बचन कीनो परमाना ॥

अब तुम पंथ चलावो जाई । पढ़ुचे जीव तुम्हारी बाई ॥

प्रथम वानिसुनि सुरतिलगावे । निश्चय दर्श हमारा पावे ॥

प्रथम बानि है ज्ञान हमारा । सुनि हँस आवै सत्य दरबारा ॥

संमत पंद्रासे बीस प्रमाना । मास जेठ बरसायत जाना ॥

तेहिदिनकालिमोउतरेपुरमाना । वंश बयालिस रोपे थाना ॥

( १३६ )

कबीरबानी

चारि गुरु निज सीख हमारा । तिन्हकी छाप चले संसारा ॥ बंस बयालिस वचन हमारा । तिन्हते सुक्त होय संसारा ॥ सहसरभांति होम जोकोइ धावै । कोटिनयोग समाधि लगावै ॥ कोटिन ज्ञान छान बिल छाने । अर्थ परीक्षा बहुविधि आने ॥ वचन वंश को बीरा नहिं पावै । फिर मरे फिरहि गर्भमें आवै ॥ धर्मदास सुनो सत्य की बानी । काल प्रपंच बहुतविधि ठानी ॥

द्वादश पंथ चलो सो भेद

द्वादश पंथ काल फुरमाना । भूले जीव न जाय ठिकाना ॥ ताते आगम कहि हम राखा । वंश हमार चुरामणि शाखा ॥ प्रथम जगमें जागू भ्रमावै । विना भेद ओ ग्रन्थ चुरावै ॥ दुसरि सुरति गोपालहि होई । अक्षर जो जोग हढ़ावे सोई ॥ तिसरा मूल निरञ्जन बानी । लोकवेदकी निर्णय ठानी ॥ चौथे पंथ टकसारभेद लै आवै । नीर पवन को सन्धि बतावै ॥ सो ब्रह्म अभिमानी जानी । सो बहुत जीवनकीकरीहै हानी ॥ पांचौ पंथ बीज को लेखा । लोक प्रलोक कहें हममें देखा ॥ पांच तत्व का मर्म हढ़ावै । सो बीजक शुक्ल ले आवै ॥ छठवाँ पंथ सत्यनामि प्रकाशा । घटके माहीं मार्ग निवासा ॥ सातवाँ जीव पंथले बोले बानी । भयो प्रतीत मर्म नहिं जानी ॥ आठवे राम कबीर कहावै । सतगुरु भ्रमलै जीव हढ़ावै ॥ नौमे ज्ञानकी काल दिखावै । भई प्रतीत जीव सुख पावै ॥ दसवे भेद परमधाम की बानी । साख हमारी निर्णय ठानी ॥ साखी भाव प्रेम उपजावै । ब्रह्मज्ञानकी राह चलावै ॥ तिनमें वंश अंश अधिकारा । तिनमेंसो शब्द होय निरधारा ॥ संवत सत्रासै पचहत्तर होई । तादिन प्रेम प्रकटें जग सोई ॥

बोधसागर

( १३७ )

आज्ञा रहै ब्रह्म बोध लावे । कोली चमार सबके घर खावे ॥ साखि हमार ले जिव समुझावै । असंख्य जन्ममें ठौर ना पावै ॥ बारवै पन्थ प्रगट है बानी । शब्द हमारेकी निर्णय ठानी ॥ अस्थिर घरका मरप न पावै । ये बार पंथ हमहीको ध्यावै ॥ बारहे पन्थ हमही चलि आवै । सब पथ मिट एकही पंथ चलावै ॥ तब लगि बोधो कुरी चमारा । फेरी तुम बोधो राज दर्बारा ॥ प्रथम चरन कलजुग स्रियाना । तब मगहर माडौ मैदाना ॥ धर्मरायसे मांडौ बाजी । तब धरि बोधो पंडित काजी ॥ बावन वीर कबीर कहाइ । भवसागरसों जीव सुकताइ ॥

कलियुगको अंत पठयते

ग्रहण परै चौंतीससो वारा । कलियुग लेखा भयो निर्धारा ॥ ३४०० ग्रहण परैसो लेखा कीन्हा । कलियुग अंतहु पियाना दीन्हा ॥ पांच हजार पाँचसौ पांचा । तब ये शब्द हो गया साँचा ५५०५ सहस्र वर्ष ग्रहण निर्धारा । आगम सत्य कबीर पोकारा ॥ तेरा वंश चले रजधानी । वंश चूरा मणि प्रगटे ज्ञानी ॥ तिनकी देह छायाँ नहिं होई । सर्वे पृथ्वी प्रमानिक सोई ॥

क्रिया सोगंद

धर्मदास मोरी लाख दोहाई । मूल शब्द बर जिन जाई ॥ पवित्र ज्ञान तुम जगमों भाखौ । मूलज्ञान गोइ तुम राखौ ॥ मूलज्ञान जो बाहेर परही । बिचले पीढी वंश हंस नहिं तरही ॥ तेतिस अर्व ज्ञान हम भाखा । मूलज्ञान गोए हम राखा ॥ मूलज्ञान तुम तब लगि छपाई । जब लगि द्वादश पंथ मिटाई ॥

द्वादशपंथका जाव अस्थान

द्वादश पंथ अंशनके भाई । जीवबांधि अपने लोक लेजाई ॥ द्वादश पंथमें पुरुष न पावै । जीव अंशमें जाइ समावै ॥

( १३८ )

कबीरबानी

तुमजिन भूलो ज्ञानमो भाई । बिगड़े हंस सब जीव भुलाई ॥

सोरठा-हमरो करै सब ज्ञान, वंस बयालिस तिलक है ।

द्वादस पंथमें मान, पुरुष शब्द तोसे कहूँ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास पूछे चितलाई । बंस बखान गुरु कहौ ससुझाई ॥

कौन वंस कौन अंस हमारा । कौन वंश अंश मर्जाद सुधारा ॥

पंथ पंगति तेहि भाव बतावौ । जैसे जगमो पंथ चलावौ ॥

तुम्हरो डर माने सब कोई । वचन डोर बाँध्यो जग सोई ॥

दास नरायण सरण न पावा । दुसरा वंश अंश धरि आवा ॥

तेहिकी पंगति कहो ससुझाई । सोई पंगति आगे चलि जाई ॥

साखी-इतनी निरभये भाखिहों, गुरु मोहि कहो ससुझाय ॥

वंश अंशकी पंगति, सब विधि देहु सिखाय ।

साखी-वंशनिखेहकी । सद्गुरु उवाच

धर्मदास सुन भेद अपारा । तुमसों कहूँ वंश अंश निरधारा ॥

समर्थ हमसों ऐसी फुरमाई । धर्मदासको लेहो जगाई ॥

धर्मदास है अंस हमारा । उन्हसों भेद कहों निर्धारा ॥

उनकी जागा एक पंथ हटावौ । पीछे हम अपनी अंश पठावौ ॥

ते जन्म लीहे धर्मदाससे आई । वोही हंसनके बन्ध मुक्तताई ॥

तिन्हके वंश चले कडिहारा । बहुत जीवनि के करे उबारा ॥

तब हम पुरुषसों विनती कीन्हा । धन्य बंस धर्मदास जो लीन्हा ॥

वो कैसे कै लोकै आवा । सोई बात गुरु मोहि सुनावा ॥

खुदबानी

तब समर्थ अस बोले बानी । धर्मदासको बंस अभिमानी ॥

ताते हम अपना अंश पठावा । जंबुद्वीपमें थाना बैठावा ॥

बोधसागर

( १३९ )

अच्छर अच्छर अतीतकी बानी । निःअच्छर कोई बिरले जानी ॥ निःअक्षर की अक्षर श्वासा । नहीं धरनी नहीं गगन प्रकासा ॥ अक्षर तीनि लोक बिस्तारा । तामें अरुझो सब संसारा ॥ तीन सुत तेज अंडमों आई । आप आप इन्हें आप हटाई ॥ चार वेद कहै तिनकी साखी । अक्षर अतीत थापि उन्ह राखी ॥ अब भिन्न भिन्न कहूं अर्थीई । सात सुरतिके स्थान बताई ॥ अक्षर अतीत माया सो कहिये । सोई सुरति निरंजन लहिये ॥ अक्षर सुरति दुतिय है स्थाना । जिनके चार वेद परवाना ॥ शब्दातीत अनहद रहता । प्रेम धाम अक्षरकी चहता ॥ चार सुरतिका भेद नियारा । तीनि सुरतिका देउ विचारा ॥ पांचे सुरति अंकुरकी बानी । पांचे स्थान तेहि ठहरानी ॥ छटे स्थाना अंकुरकी है आपा । जेहिते सात करी उततापा ॥ सातवी सुरति सहजकी रही । उहि समरथको देखा सही ॥ सात सुरति सात है स्थाना । मूल सुरति है समर्थ प्रमाना ॥ सहज सुरति सब सुतं उपजाई । मूल सुरति लै हंस समाई ॥ मूल सुरति है सबको मूला । सात सुरतिको एक स्थूला ॥ सात सुरति मूल सिध सब माहीं । धर्मदास लखि राखौ ताहीं ॥ शब्द पांजी इतना परमाना । अब कहूं कायाकी बन्धाना ॥ सातों सुरति कायामें रहै । औ काया धरि बातें कहै ॥

सुरति स्थान

प्रथमहि दीप अमर मनियारा । तहैं वा मूल सुरति बैठारा ॥ दुसरा अजर दीप तहाँ कीन्हा । सहज सुरतिको बैठक दीन्हा ॥

चौपाई

तीसर दीप हिरण्मय सोई । सुरति अंकुरकी बैठक होई ॥ चौथे दीप सुरंग निर्मावा । ओहं सोहं तहाँ बैठवा ॥

( १४० )

कबीरबानी

पाँचवें अघर दीप रहे वासा । तहाँ है अचित सुरतिको वासा॥ छठये पच्छ दीप जो कीन्हा । तहाँ अक्षरसुरतिको बैठकदीन्हा॥ सातवीं सुरत कलदीप बिलमाना । काम कोध मोह तहाँ समाना ॥ सातवीं सुरति सातहुँ स्थाना । तीनसुरतिनिरंजनकालप्रमाना॥ पुछुप दीप है सबते न्यारा । तहाँ समर्थसे जीव विस्तारा ॥

साखी-घटघटकी जो परच कहो, सब स्थान बताय । कह कबीर बिनु काया परचै, फिरि फिरि रह भटकाय॥

साखी-सुरति पांजीकी धर्मदास उवाच

मैं सद्गुरु तुम्हरी बलिहारी । कर्म फास कैसे निरुवारी ॥ मोहि कहो जेहि दुख ना होई । काल चरित्र कहौ सब सोई ॥ जो तुम्हरे दिल आवे गुसाई । संशय जालते लेहु छुड़ाई ॥

साखी-तुम्हरो भेद अगम्य है, काहु लख्यो नहीं भेद ।

सुर नर मुनि सबही ठगे, सनकादिक शुक्देव ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास सुनियो चितलाई । तुम जनि शंका मानों भाई ॥ पंथ हमारो चलावो जाई । वंश ब्यालिस अटल अधिकाई ॥ वंश ब्यालिस अंस हमारा । सोई समरथ वचन पुकारा ॥ वंश ब्यालिस गरवाई दीन्हा । इतना चर हम तुमको दीन्हा ॥ वंश अंश समरथ कडिहारा । सोइ जीवनको करे उबारा ॥ तुम जिन शंका मानो भाई । समरथ वचन राखो चितलाई ॥ अटक काहुकी तुम जिन मानों । पाँन नाम तुम निश्चय जानों ॥

साखी-तुम समर्थके अंश हो, जाग्रत वंश तुम्हार ।

समर्थ बचन जनि छोड़हुँ, मानो बचन हमार ॥

बोधसागर

( १४१ )

साखी-व्यालिसके निकासी-धर्मदास उवाच धर्मदाम जब विनती लाई । हमसों पन्थ ना चले गोसाईं ॥ नरदेहीसों पन्थ चले ना भाई । जाते अपना अंश पठाई ॥ अंश बयालिस देहु पठाई । ते जग हंस लेहि सुकताई ॥ तुम्हें सिखावन हमसों लीना । तुम्ह लै धर्मदासको दीन्हा ॥ बचन वंश एक है भाई । नाम वंश जग मैं बताई ॥ बचन वंश है आदि निशानी । तिन्हकी पावै जग सहेदानी ॥ नाम नरायण हैं अभिमानी । तुम संसार फिर जावो अब ज्ञानी ॥

कबीर उवाच

तब समर्थ मोसे अस कही । बंशहि अस चुरामणि सही ॥ तुम्ह जो सिखावन हमसों लीन्हा । ऐसा जग चुरामणि कीन्हा ॥ संधिक नाम है उन्हकी देही । पावै हंसा जो हमरे सनेही ॥

साखी-यह निज बचन समर्थके, हमसो मेटि न जाय । अमीनिको मैं सोंपो है, तुमको सोंपि न जाय ॥

साखी-धर्मदास उवाच

धर्मदास तब भए मलीना । उठि सद्गुरुसों विनती कीन्हा ॥ हो साहेब मैं तुम बलहारी । बंसनारायन शरण तुम्हारी ॥ नाम प्रतीत तुम करो संभारी । नामनरायन तुम बोल विचारी ॥ अपनी बोध राखौ संसारा । विन्द बंस प्रण आए हमारा ॥

साखी-इतनी विनती मैं कहूं, तुम दाता गुरु मोर ।

संशय मेटो जीवको, लेहो फँदको छोर ॥

साखी-वंश विषेदकी-सतगुरु उवाच

धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घटमें बुद्धि बढ़ देखी ॥ घर घर गुरु जगतमें होई । हमरे गुरु बचन बंस है सोई ॥ वह सब करै सुख चतुराई । ताते जीव राखे भरमाई ॥

( १४२ )

कबीरबानी

मान तजी लेहि परमाना । खोवै जगतपान अभिमाना ॥ बचन बंशकी पारख पावै । सोइ हमारे बंश कहावै ॥ बचन बंश पारख नहिं होई । बंश हंस सब जाय विगोई ॥ बचन बन्धीए वंश अधिकारा । पारस सरूपी है संसार ॥ पार्स छुवे लोहा कँचन होई । पोहोष बास तिल भेदे सोई ॥ बचन वंश है पुरुष सनेही । कागरूपते हंस करि लेही ॥ सो सब उत्पत्ति कहो समुझाई । जो चीन्हे तो लोके जाई ॥ धर्मदास तुम पन्थके राजा । नाद बिंदु हम दोनों साजा ॥ तुम्हरे वंश पंथके कडिहारा । बचन वंश लोक सठिहारा ॥ सतगुरु बचन लेहि सिर नाई । तब तुमरे वंश करे गुरुवाई ॥

साखी-कहै कबीर

नाम नरायण जगदगुरु, करै बोध संसार । बचन प्रतापसे छूटहि, वो समर्थके कडिहार ॥

साखी-वंश अंसनके-धर्मदास उवाच ॥

धर्मदास विनती अनुसारी । साहब विनती सुनो हमारी ॥ काया पांजीको भेद लखाओ । वंशअंश दोऊ तत समझावो ॥ वा सन्धि कहोजातेहोयउबारा । सोई भेद तुम कहो पुकारा ॥ धाम चारिका भर्म बताओ । कैसे कैलसो आनि समावो ॥ धर्मराय जो अपरबल बीरा । तीन लोकमें ताकी पीरा ॥ कैसे पंथ चले जगमाहीं । तीन लोकमें ताकी छाहीं ॥

साखी-पांजी भेद लखा न हो, वंश अंशनिर्धार ॥

इतनी संशय मिटावहु, सतगुरु हंस उबार ॥

साखी-कायापांजी-सतगुरु उवाच

धर्मदास कहौ समुझाई । काया पांजी आदि है भाई ॥ सुर नर मुनि कोई गम्य न पावा । झूठी आस बांध सब धावा ॥

बोधसागर

( १४३ )

पांजी चार भेद है भाई । चार अंश सब जगहि भ्रमाई ॥ अक्षर तीनि लोक उरझावा । तीनि लोक अक्षर ठेहेरावा ॥ जम्बु दीप है यमको बासा । कैसे सुक्ति होय परकासा ॥ तुम तो जुगन जुगन चलि आए । काहे न शुक्ल जीव सुत्ताये ॥ चारि वेद तुम्हें नाहीं माने । वेद किया सब जीव समाने ॥

साखी-हमसों पंथ ना चलिहै, भवसागर दारुण है दन्द ॥

वंश बयालिस तारहु, काटो कर्मके फंद ॥

सद्गुरु उवाच

मुनो धर्मदास कहैं मैं तोहीं । तुम नहिं निजके चीन्हे मोहीं॥ हमरो कह्यो नहिं मान्यो भाई । अपना वंश मान्यो सुकताई ॥ सकल सृष्टि गुरु तुमकूँ कीन्हा । तुमसों बंस बयालिस लीन्हा ॥ तुमको जानि बड़ाई दीन्हा । जक्तगुरु हम चूरामणि कीन्हा ॥ हमसों समरथ ऐसी कही । चूरामणि वंश जीवन निरवही ॥ वचन वंशको जो नहिं मानी । ताको काल करै जिवहानी ॥ तुमकूँ सेवै गुरु न्यवहारा । सो देखे समरथ दरबारा ॥ जो नहिं मानें कहा तुम्हारा । ताका सास्तीकरै वहिपारा ॥

चौपाई-तुम गुरु बयालिस वंशके, हम कह्यो वचन टकसार॥

तुम्हरे हाथ जीव सब पहुँचहि, तुम समर्थ कडिहार॥

साखी-गुरुन्याख्यानकी-धर्मदास उवाच ।

हो सतगुरु मैं तुम बलिहारी । हिममान्यो निजकह्यो तुम्हारी॥ तुम सतगुरु हम शिष्य अजाना । तुम सम हम पुरुष पुराना ॥ गुरुवाईका लेखा सुनाओ । बिन लेखा जीव कैसे सुत्तावो ॥

साखी-लेखा कहो तुम सद्गुरु, सब संशय निरधार ।

हम गुरुवाई करी हैं, मान्यो वचन तुम्हार ॥

( १४४ )

कबीरबानी

चौपाई-गुरुवाईको जुगति-सदगुरु कहै ।

सुनो धर्मदास कहों मैं बानी । बात हमारी तुम निश्चय मानी ॥ वचन वंश नहीं लगै भारा । लेखा देखि चले कडिहारा ॥ बिन लेखा गुरुवाई करहीं । आसाबन्ध कालमुख परहीं ॥

चौथा बिसथारकी जुगति

प्रथम लेखा जब चौका पोतावै । तब निकुत मंत्र ले नीर मँगावै ॥ दुसरे चौका पूरौ भाई । काया मूलको मन्त्र जगाई ॥ तिसरे आसन करौ विस्तारा । पुरुष शब्द निज करौ पुकारा ॥ चौथे कलश ले आगे राखौ । पंचतत्वको मन्त्र मुख भाखौ ॥ पाँचमो नारियर स्नान करावौ । सोहं शब्द ले भद्र करावौ ॥ छठवें स्वेत मिठाई आनौ । मानसरोवर मन्त्र बखानौ ॥ सातवें उत्तम पान मँगावो । पक्ष पालना मन्त्र गोहरावो ॥ आठवें दलकी जुगति सुधारी । दयाशब्द धोखौ अधिकारी ॥

सारखी-अरु कपूर लौंग इलायची, दल निरनेकी जुगति ।

विधि विल छानि केन्द्रहुँ, दीन्हा गुरु जिव मुक्ति ॥

चौपाई

नौमे नया वस्त्र ले आवो । अमर चीरको मन्त्र जपावो ॥ दसवें सोरा सुपारी धरहु । पाताल अंशको मन्त्र उचारहु ॥ ग्यारवें पाँच बरतन आनौ । आदि नामको मन्त्र-बखानौ ॥ बारहें आनि धरो परवाना । संधिकमन्त्र कहो परवाना ॥ तेरहें चँदवा छत्र बनाया । समरथ मन्त्र छत्रपति आया ॥ चौदहें आरति आनि बनाई । सोहँग मन्त्र निर्णय गोहराई ॥ पंद्रहें तिनका अर्पण कीन्हा । चौदा यमका मन्त्र तब चीन्हा ॥ सोरहें षोडश मन्त्र प्रवाना । कदली दल तहाँ उत्तम आना ॥ सत्रह सतगुरु करे निशानी । सो नरियर मों डारो पानी ॥

बोधसागर

( १४६ )

अठारवें अमिशब्द ले नरियर मोरे । नहीं तो काख सीस लै तोरे ॥ विना एकोत्री जो कडिहारा । ते सब बांधे यमके द्वारा ॥ विना लेखे जो गुरु कहावे । गुरु डूबै शिष्य पार न पावे ॥

साखी-इतना लेखा पावै, सो साँचो कडिहार ।

कहैं कबीर बिन लेखा जाने, छलइ काल बटपार ॥

साखी-कडिहारी भेदकी धर्मदास उवाच

साहेब इतना भेद न आवै । सो नाही कडिहार कहावै ॥ मूल भेद तुम कहो प्रमाना । तेहिते हंस होय निर्वाना ॥ मूल भेद है आदि निशानी । सो समरथके होय प्रमानी ॥ इतनी परचै हमकूँ दीजै । मूल भेदकी दया गुरु कीजै ॥ गुरु सोई जो ज्ञान बतावै । और गुरु को काम न आवै ॥ साखी-धर्मदास कीया करै छुऔ सतगुरुके पाँव ।

साहब जो मैं तुमते बिछुरो, तो मूलशब्द बारह होइ जाव ॥

साखी-मूल भेदकी सद्गुरु उवाच

धर्मदास कहो मैं सोई । मूल भेद घट राखौ गोई ॥ गुरु मर्याद काहू ना पाई । ताते शब्द तुम राखौ छिपाई ॥ मूल भेद है अगम अपारा । विरला हंस पावही पारा ॥ सुर नर मुनि गण गन्धर्व देवा । तिनहु मूल नहीं पायो भेवा ॥ काया मूल है आदि निशानी । सौ धर्मनि तुम सुनो प्रमानी ॥ जो निज योग समाधि लगावै । सो तो लाभ तिनहुँ नहीं पावै ॥ चार वेद जिस आगम बखाना । मूल भेद वेदो नहीं जाना ॥ अक्षर मूलकी उत्पति भाखी । अजर मूल लै बारह राखी ॥ अजर मूल है सबको मूला । तेहिते प्रथम काया है स्थूला ॥ लाखौ सैनमें देउ लखाई । अजर मूल लै लोक समाई ॥ भिन्न भिन्न सब मूल बताऊं । अजर मूल माया दिखलाऊं ॥

नं. ७ कबीरसागर - ६

( १४६ )

कबीरबानी

मूल भेद

प्रथम मूल आदि है भाई । जिन सब उत्पति अंकुर बनाई ॥ दूसर मूल वानी है व्यवहारा । तेहिंते सहज सुरति निरधारा ॥ तीसर मूल मर्मको पावै । मूल सुरति सब भेद बतावै ॥ चौथ मूल सोहंग बैधाना । तामैं सुरति ओहंग समाना ॥ पाँचवै है अर्चित पर बानी । प्रेम सुरति तिहि माँहि समानी ॥ छठै मूल अक्षरकी बानी । योगमाया अक्षर उत्पानी ॥ सातवै मूल अक्षरहीकी बानी । तेहिंते कैल निरंजन जानी ॥ अक्षर मूल है सातवै काला । त्रिगुण काल उत्पति प्रतिपाला ॥ चार काल अपरबल बीरा । जाते जीवको व्यापे पीरा ॥ इतनो मूल चारि काल बखानी । अजर मूल चारि माँहि समानी ॥ सद्गुरु मिले तो भेद लखावै । बिना सतगुरु कोइ पार न पावै ॥

साखी-बिनु सद्गुरु बाँचे नहीं, कोटिन करै उपाय ।

अजर मूलका खोज न पावै, बांधे यमपुर जाय ॥

साखी-मूल व्याख्यानकी धर्मदास उवाच

तुम सद्गुरु हो समरथ दाता । कैसे मिटे कालकी घाता ॥ तौन भेद गुरु देहु बताई । जेहिंते हंस लोकको जाई ॥ शब्द परीक्षा हमको दीजै । सब जीवनकी परचै कीजै ॥ कैसे सीख हम करै संसारा । तौन भेद मोहे कहो विचारा ॥ कैसे तरिहैं जगके हंसा । कैसे निर्भय तुम्हारे वंसा ॥

साखी-वंश अंशकी निर्णय, हमसों कहो समुझाय ।

केहि विधि हम जो निस्तरे, कैसे लोकहि जाय ॥

सद्गुरु उवाच

सुनो धर्मदास कहूं मैं तोही । वचन वंश प्रताप है सोही ॥ वंश बयालिस वचन हमारा । जिनको समरथ है रखवारा ॥