भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १२३ )

चार अंश अक्षरते भयञ्ज । सर्वं सृष्टि भंडार ते ठयञ्ज ॥ प्रथम अंशते माया भयञ्ज । शुद्ध बीज पृथ्वी महँ ठयञ्ज ॥ दूसरे अदल अंश निर्माए । रसना सहस्र तिनते निरमाए ॥ तिसरे कुर्म भये अवतारा । जिनसर्वं पृथ्वीको लीनो भारा ॥ चौथे अंश भये धर्मराई । जिन्हें पाप पुण्यको लेखा पाई ॥ चार अंशको देखि भुलाना । तब अक्षर घटमाहिँ समाना ॥ तब समर्थ एक युक्ति बनाई । सातवाँ अंश तब आनि समाई ॥ तेहिंते निद्रा उपजी भाई । सत्तर निमिष युग गयो सिराई ॥ जब लगि निद्रा अक्षरकूँ आई । तब कछु दृश्य रहै ना भाई ॥ सब समर्थ मन शब्द उचारा । तेहिंमो कैल अण्ड भयो भारा ॥ तेहि अण्डमें उत्पति भूपा । नाम निरञ्जन ज्योति सरूपा ॥ तिनते तीन देव भए भाई । यहाँ सब लेहु लखि भाई ॥ सर्वं सृष्टि काल धरि खाई । काल देवको कोई न पाई ॥

साखी-टीकाका

सात सुरति तब मूल हैं, उत्पत्ति सकल पसार । अक्षरते सब सृष्टि भई, कालते भये तिछार ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सांचे सदगुरुकी बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥ और भेद सर्व हम पावा । आठमी इच्छा कीन्ह निर्मावा ॥ केहि कारणते इच्छा कहाई । अनइच्छा किमि कारण आई ॥ किमिकारणस्वरूपजोकालबनाई । यहाँ अविगति गति कहो समुझाई साखी-सत्य पुरुष तुम आदि हो, बोलो शब्द रसाल । अन इछाको मर्म कहां, जेहिंते उपज्यो काल ॥