भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १२६ )

तिसरी पांजीका भेद अपारा । तुमसो धर्मनि कहों विचारा ॥ पाताल पांजी है जीव उबारा । भजन प्रतापसों उधरे दूबारा ॥ वाचा बंधको द्वार बनावा । तेहि पांजी गुरु भेद बतावा ॥ पांच भेद पाताल विनाशी । ताते काल करै नहिं हाशी ॥ तेहि पांजी जलरंग गुसाई । चौदह मुनि है तिनके ठाई ॥ जलरंग पासको भेजदो पावै । लोकै जात बार नहिं लावै ॥ सोरा लोक सोरा दरवाजा । सोरा अंश तेहि माँहि बिराजा ॥ सोरा अंश चिह्न जो पावै । जाके सद्गुरुनिज भेद लखावै ॥

साखी-तीनि पांजीके निर्णय, तुमसों कहो समुझाय ।

सार शब्द जो पाए तो, छिनमें हंस घर जाय ॥

धर्मदास पूछे मंत्र जो शुद्धा

सत्य सत्य मुख दयाजो कीजै । अपनोके मोहि निज कर लीजै ॥ तुम समर्थ गुरु जत्त के कर्ता । सकल भेद जो निर्णय वार्ता ॥ हम चीन्हा तुम बरन छिपाए । बरन छिपाये तुम जगमां आए ॥ आए तुम समर्थ हो अंतर्जानी । सत्य कहौ हम निश्चय मानी ॥ जो अपना कर जानो मोहीं । तो अपना तत्व बताओ सोहीं ॥ अब तुम कहो कैसे जग आये । कैसे तुम जोलहा कहाये ॥

साखी-एहि सब कारन भाखिहो, सब संशय मिटिजाय ।

अपनो कै प्रतिपाल हो, हंस लियो मुकताय ॥

चौपाई-सतगुरु खुदा होय प्रकटे साखी-खुदबानीकी सतगुरु बचन बिहँसिके बोले । सत्य सत्य तुम अन्तर खोले ॥ तुमसो अंतर कछू न राखों । सकल भेदकी निर्णय भाखों ॥ कहत बचन प्रतीत न आवै । तजत देह जीव ठौर न पावै ॥ तुम युग बंध होए कोई सेवकाई । तेहि पीछे हम भेद लखाई ॥ धर्मदास करनी निज करिहो । सीस उतार निज आगे धरिहो ॥