कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कृपाल, दलन निखिल कालजाल, प्रगटे अविनाशी ॥ कुन्दु इन्दुके समान, विमल वपु प्रकाशमान, मंगलमय सुभगध्यान, तेजपुञ्जराशी ॥ लीला एक करी नाथ, गनिकांको पकरि हाथ, फिरे लिये साथसाथ, कीन्ही जगहाँसी ॥ माया मन धारि टेक, कीन्हों छल बल अनेक, हारी नहिं चलयो एक, कम्पित है त्रासी ॥ प्रवर पूज्य परमपितृ, दयासिन्धु दीनमित्र, पतितन कीन्हों पवित्र, परखपद प्रकाशी ॥ कुपथ कुटिल कर्म कोहै, दम्भदोष मान द्रोह, काम कोष लोभ मोह अखिल शत्रुनाशी ॥ जाप जपत नसत पाप, जामु नामके प्रताप, शरण सुखद हरण ताप, अमरपुरंनिवासी ॥ गावत गुण धरि विश्वास, नित्यंप्रति वसिष्ठ व्यास, धर्मनि तज सकल आस, चरणनकी दाँसी ॥९॥
मिथ्या मायाजाल जगत मन, क्यों तू देख भुलाया है ? ॥ टेक ॥ सुमनैं सुहावन सुन्दर फल लखि, सेमर सुवा लुभाया है । मारी चोंच रुई निकरी जब, तब मनमें पछताया है ॥ धूमसैमूह जानि घँन चाँत्रिक, तृषां विवश हो धाया है । मिटी न प्यास भयो दुख दारुण, नयनहीन अकुलैलाया है ॥ सुँत वनितौं इत्यादि सकल निज, स्वारथ प्रीति लगाया है । यह मन मूढ मूढैताके वश, मोहजाल उरझाया है । प्रबल अविद्यैके प्रताप शठ; फिरि चौरासी आया है । कहैं कवीर चेत नर अजहू, मानुष योनी पाया है ॥ १० ॥
१ नारायित. २ चन्द्रमा. ३ शरीर. ४ प्रकाशका समूह. ५ वेश्या. ६ पिता. ७ कुमार्ग. ८ देहा. ९ कल्पना. १० सत्यलोकके रहनेवाले. ११ चरित्र १२ श्रद्धा धारण करि १३ सदाकाल. १४ परिचारिका. १५ फूल. १६ धुआँका पुंज. १७ बादर. १८ पपीहा. १९ प्यास. २० बौडा. २१ मयंकर. २२ व्याकुल हुआ. २३ पुत्र. २४ स्त्री. २५ मूर्खता. २६ अज्ञान. २७ खानि.
कवीरपंथी-शब्दावली ४