भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१८)

कबीरपंथी—

मानुषको तन पाय जन्म क्यों, मूरख वृथा गमाँवै है ॥८०॥ अति अमोल कंचनघटमें शंठ, हठ करि विष भरवावै है । पाय पियूष पखारन पद हित, मन्दमंती ढरकावै है ॥ ऐरावत गजराजपै मूरख, ईधनभार लदावै है । बहुश्रमकैरि लैहि चिन्तामणि तेहि फेंकिकै काग उडावै है ॥ आक रुईके हेत खेत कंचन के हर जोतवावै है ॥ कल्पंतहूको काट धतुरा, आँगन माहि लगावै है ॥ कहै कबीर सूढता कहाँलग कहैं, कही नहि जावै है । तजि गुरुज्ञान वारि सूरसरिता, मृगजलै प्यास बुझावै है ॥ ११ ॥

रागिनी औरबी समय सूर्योदय ।

अब मोहिं दरशन दीजे कबीर । तुम्हरे दरशसे पाप कटत हैं, निरंमल होत शरीर ॥ ८० ॥ त्रिविधताप भोगत चौरासी, अति जिव भयो अँधीर । अब तो कृपासिन्धु दुख मेटो, यमसे कागदचीर ॥ भवसागरमें नैया अटकी, वशपरि विषय सँमीर । डूबत आय उबारो प्रभुजी, खेय लगावो तीरै ॥ कोई ध्यावत गौरी शंकर, कोइ सिया रघुवीर । मेरे तो एक तुमही धनी हो, क्यों न हरो यह पीर ॥ धर्मदास विनवे करजोरी, प्रभु तुम गुण गंभीर । मैं अति हीन दीन शठ पामैर, क्षमा करो तर्कसैर ॥ १२ ॥

सत गुरु हो ! मोहिं उतारो भवपार । तुमबिन और सुनैको मेरी, औरतनाद पुकार ॥ ८० ॥ गहरी नदिया नाव पुरानी- आय परी मैंझें धार । विषय बयँर प्रबल चहुँदिशसे, तापर करत प्रहँर ॥ ताँत मात सुत भाई बन्धु तिय, लोक कुटुम परि- वार । अपने अपने स्वारथके हित, राखत सब व्यवहार ॥ नेम

१ निरफल. २ सुवर्णका घटा. ३ मूर्ख. ४ आग्रह. ५ अमृत. ६ पावघोनेके लिये. ७ मूर्ख. ८ घडेमेंसे बाहर बाहर निरता है. ९ इन्द्रका हाथी. १० जलानेकी लकड़ीका बोझा. ११ बडे परिभ्रमसे. १२ पाया. १३ रत्न विशेष. जो चिन्त मात्रसे सब कुछ दे देता है. १४ कल्पवृक्ष. १५ गंगाजल. १६ मृगतृष्णाका जल. १७ मुह १८ केंच रहित. कायर. १९ वायु. २० किनारे. २१ अधम. २२ अपराध. २३ दुःखित चिलाहट. २४ बीछ. २५ वायु. २६ ताडना. २७ पिता.