कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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धर्म व्रत यज्ञ दान तप, संयम नेम अचार । इनके फलसे स्वर्ग भोगकरी, फिर जन्मे संसार ॥ कृमी कीट पशु पक्षी आदिक, योनिनमें बहुवार । अमि अमि भटकयो चौरासी, दुख सहि अगम अपार ॥ धर्मदास विनवे करंजोरी है अति निरआंधार । शरणा; गतकी लाज तुम्हे प्रभु, अधम उधारन हार ॥ १३ ॥
गुरुसम और कहो को दानी । अति मतिहीन दीन शठ तारे विरदंलाज उर आनी ॥ १४ ॥ वालमीक नारद अगस्तमुनि, आदि और बहुज्ञानी । गुरुप्रसादसे नीच उंचमये, वेदपुराण बखानी ॥ जप तप आदि करें संयम व्रत; मुनि मुनि नाना बानी । तदपि न भिटै बिना सतगुरुके, चौरासीकी खानी ॥ लोकवेदकी कर्मधारमें बहे जात अभिमानी । त्रिविध दुसह दुख देखि दयानिधि, प्रेच्यो परख निशानी ॥ को कवीर गुरु इव करुणालय वेद वदति इति जानी । तद्विज्ञान हेतु शरणागत, गच्छ सकल अम भानी ॥ १४ ॥
गुरुसम को जगमें हितकारी । कलिमैलप्रसित अधम शठ पापर, बहु तारे नर नारी ॥ १५ ॥ हरिमाया करि त्रिभुवैन फैल्यो, भवदुख महाविकारी । रविकरनिकैर समान ज्ञानघन, गुरु अज्ञान प्रहारी ॥ हरिके कृत जिव जात रंसातल; गुरु तेहि लेत उंवारी । हरिसे गुणहैं अधिक गुरुके, देखो हृदय विचारी ॥ नारदमुख गुरुनिन्दा मुनि हरि, कोपें कियो अति भारी । गुरु करुणानिधान एक पलमें, चौराशी भंय टारी ॥ कहि न जात उपकार अनेकन,
१ हाथ जोड़ प्रार्थना करते हैं. २ अवलम्बरहित. ३ पापियोंको तारनेवाले. ४ महात्म्यको कृत्वा. ५ गुरुकी प्रसन्नतासे. ६ साधन. ७ तीन प्रकारके. ८ परीक्षाके लक्षणको. योजना की. ९ दयाके भवन. १० मूषक उपनिषदके खण्ड २ के मंत्र २१ में कहा है कि “तद्विज्ञानार्थ स गृहमेवाभिगच्छेत्, सत्कृत्पाणिः क्षत्रियं बह्मनिष्ठम्” अर्थात् जिस परमात्माके विशेष ज्ञानके अर्थ पूजनकी सामग्री हाथमेंलेकर जानी और खलिष्ठ गुरुकी शरण जावे ११ अर्थात् छोड़कर. १२ पापमें फंसे. १३ तीनों लोकमें १४ सूर्यसमूह. १५ नायकता. १६ पाताल १७ बचालेना. १८ कोष १९ दयाल २० डरभेदना.