कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(१०१)
रचि, तीन लोक विस्तारा ॥ टे० ॥ हरिहरब्रह्माको प्रगटायो, तिन्है दियो शिरभारा । ठाँव ठाँव तीरथ रचि रोप्यो, ठगवेको संसारा ॥ चौराशी बिच जीव फँसावे, कबहु न होय उँवारा । जारि बाँरि भँसमी करि डारे, फिरि देवे औतारा ॥ आवाँगमन रहे उरझावे, बाँरे भवकी धारा । सतगुरु शब्द विना नर चीन्है, कैसे उतरे पारा । मायाफाँस फँसाय जीव सब, आप बने करतारा । सत्य पुरुषका अमरलोक है, ताको मूँढो द्वारा ॥ नेम धर्म आचार यज्ञ तप, ये उँरले व्यवहारा । जासे मिले अखण्ड मोक्ष सुख, सो मारगँ है न्यारा ॥ कालजालसे बाँचा चाहो, गँहा शब्द ततसारा (टकसारा) * । कहै कवीर अमर करि राखों, जो निज होय हमारा ॥ १८ ॥
सन्तो ! सतगुरु अलैंख लखाया । परम प्रकाशक पुच्छें ज्ञान घन; घट भीतर दर्शोया ॥ टे० ॥ मन बुधि बानी जाहि न जानत, वेद कहत सकुँचाया । अगम अपार अथाहँ अगोचर, नेतिँ नेति जेहि गाया ॥ शिव सनकादि आदि ब्रह्माके, वह प्रभु हाथ न आया । व्यास वशिष्ठ विचारत हारे, कोई पार न पाया ॥ तिलमै तेल काष्ठमै अग्नि घृतै पयँ माँहि समाया । शब्दमै अर्थ पदार्थ पदमै, स्वरमै राग सुनाया ॥ बीजमाँहि अंकुर तँरु शाखों, पत्रै फूल फल छाया । त्यों आत्ममै है परमात्म, ब्रह्मजीव अरु माया । कहै कवीर कृपाल कृपा करि, निज स्वरूप परखाया । जपतप योगयज्ञ व्रत पूजा, सब जञ्जाल छुड़ाया ॥ १९ ॥
सन्तो ! सो निज देश हमारा । जहाँ जाय फिर हँसै न आवे,
१ वनाके स्थिर किया. २ नित्सार. ३ जालकर. ४ राख. ५ जन्म. ६ आना जाना ७ दुबावे. ८ कण्टका जाल. ९ दरवाजा. १० धधरके जगतके. ११ पन्थ. रस्ता. १२ धारणकरो. १३ अगोचर. १४ समूह. १५ दिखाया. १६ संकोच किया. * कहीं कहीं ऐसा भी आया और इससे भी शुद्ध ही भाव निकलता है। १७ गहरा. १८ ऐसा नहीं ऐसा नहीं मान किया. १९ घों २० दूध. २१ वस्तु. २२ पदका अर्थ. वृक्ष. २३ डाली २४ पत्ते. २५ आत्मा.