भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

भवसागर की धारा ॥ टे० ॥ सूर्य चन्द्र नहिं तहाँ प्रकाशत, नहिं नभें मंडल तारा । उदयं न अस्त दिवस नहिं रजनी, विना ज्योति उजियारा ॥ पाँचतत्त्व गुणतीन तहाँ नहिं, नहिं तहैं सृष्टि पसारा । तहाँ न मायाकृत प्रपंच यह, लोक कुटुम्ब परिवारा ॥ क्षुधा तृषा नहिं शीत उष्ण तहाँ, सुखदुखको संचारों । आँधि न व्योंधि उ्योंधि कछु तहाँ, पाप पुण्य विस्तारा ॥ ऊँच नीच कुलकी मर्यादा, आश्रम वैर्ण विचारा । धर्म अधर्म तहाँ कछु नाहीं, संयम नियम अचारा ॥ अति अभिराम धाम सर्वोपर, शोभा जासु अपारा ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो, तीन लोक से न्यारा ॥ २० ॥

सन्तो ! माया तनी न जाई । सदा एकसंग रहत है जैसे, वेल वृक्ष लपटाई ॥ टे० ॥ काम तजे तो क्रोधु न छूटै, क्रोध तजे तो लोभा । लोभ तजे उर आशा बाढै, मान बढाई शोभा ॥ गृह त्यागे फिरि मँठी बनावे, उदय अस्त दै फेरी । कुटुम्ब छोड़ शिष साखा मूड़ै, ममता बढे घनेरी ॥ देखनको पैसा नहिं छूवे, कौड़ी मिली न छोड़े । गुरुभंडारा हेतु नाम लै, मांगि २ धन जोड़े ॥ कर्म संयोग मिलै नहिं जबलों, तबलों महा विरांगी । मिले न करि सन्तोष रहै मन, तृष्णा पीछे लागी ॥ शिष्य समीप पुजावनके हित, सौ योजना चलि जावे हमे छोड़ मति औरको मानो, यह उपदेश ददावे ॥ सोइ त्यागी जो करे न इच्छा, मिले द्वेष नहिं मानै । कहैं कबीर सुनो भाई साधो, माया झूठी जाने ॥ २१ ॥

सन्तो ! समुझेकी मति न्यारी । निज दुख सुख सम सबको जाने, आतम तत्त्व विचारी ॥ टे० ॥ औरनको उपदेश दँदावे,

१ आकाश. २ प्रभात. ३ संध्या. ४ दिन. ५ रात्रि. ६ पृथ्वी. जल. अग्नि वायु, और आकाश. ७ सत्व, रज और तम. ८ मूख । ९ प्रवेश १० मानसिक दुःख. ११ शारीरिक रोग १२ उपद्रव. १३ बह्मचारी गृहस्थ, वानप्रस्थ. सन्यासी. १४ ब्राह्मण. क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । १५ १ कुटी. १६ त्यागी । १७ निरन्तर कराने ।

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