कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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आप स्वतः नहीं मानें । सुख कुछ और हृदय कुछ औरहि, कैसे रामहि जाने ॥ औरसे कहे मोह नहीं कीजे, जो चाहो सुख भाई । माया मोह आप उरझाने, धिक् ऐसी चतुराई ॥ जग-प्रपञ्च है अति दुखदाई, कहि औरहीं समुझावे । आप रहत निशदिन प्रपञ्चमें, मिथ्या साधु कहावे ॥ बैरागी बनि पर वैभंवलखि; हँसिके नाक सिकोडे ॥ परी अपावन फूटी कौडी, तेहि देखी नहीं छोडे ॥ निज स्वारथको कथा सुनावे, बहुविध करि बकवादा । सो जगमें पण्डित कहवावे, है मूरखके दादा ॥ राग द्वेष जबलग घटभीतर, क्या भयो वेष बनाये । खर नहीं होत केश्रौरी कबहूँ, सिंहकी खाल्ल उढाये ॥ जो चेतन तेरे उर अन्दर, सोई सब घटमाहीं । कहैं कवीर राम किमि दर्शै, मैं तू छूटत नाहीं ॥ २२ ॥
सन्तो ! सहजसमाधि भली है । जबसे कृपा भई सतगुरुकी कितहुँ न वृत्ति चली है ॥ टे० ॥ जहँ २ जाऊं सोइ परिकरमा, जो कुछ कहूँ सो पूजा । गृह उद्यौन एकसम लेखों, भौव मेटि उरदूजा ॥ सोहँ हंसः से मनराता, मलिन वासैना त्यागी । सोवत जागत ऊठत बैठत, निशदिन तौरी लागी ॥ श्रवैण नाशिकै मुख निरोधैकरि हँठसे स्वास न रोकों । खुले नयन प्रत्यक्ष निरन्तरै, परमात्म अवलोकों ॥ कहैं कवीर योगकी रहनी, सुगमै प्रगट करि गार्ई । आसन प्राणायाम धारणाध्यानरहित सुखदाई ॥ २३ ॥
सन्तो ! मोहिँ कौन समुझावे । जीव ब्रह्म दोऊ एक कि न्यारे, याको भेद बतावे ॥ टे० ॥ एक कहे बहु शंका होवै, दो कहते सकुचावै । कहुँ २ एक कहुँ दो वँगैय, शास्त्र उभैय विधि गावे ॥
१ एश्वर्य. २ अपवित्र. ३ सिंह. ४ चर्म. ५ शीतर. ६ शरीर. ७ चित्तकी एकाग्रता. ८ अंतःकरणका परिणाम, सुरति. ९ परिक्रमा. १० वन, जंगल. ११ भावना. १२ इच्छा. १३. ध्यान. १४ कान. १५ नाक, १६ बंदकर. १७ बलकरके सदा. १८ सर्वदा. १९ देखूँ. २० सहज २१ वर्णन करता है. २२ दोनों.