कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
ब्रह्म अखण्ड अनादि निरन्तर, इमि श्रुति कहि गोहरावै । जीव सदा उपजै पुनि विनशै, सो किमि ब्रह्म कहावै ॥ सर्वे शक्तियुत वह अरु यह जिव, अलैपसे काम चलावै । वह सर्वज्ञ त्रिकालको दर्शी, यह कछु लखि नहि पावै ॥ अस वितर्क सतगुरु विन दूजा, को करि कृपा मिटावै । ब्रह्म स्वच्छन्द जीव माया वश, प्रगट कवा दिखावै ॥ २४ ॥
सन्तो ! को जगको समुझावै । तजि प्रत्यक्ष सतगुरु परमेश्वर, जडको पूजन जावै ॥ टे० ॥ जडपूजाके फल अदृष्ट है, कालान्तरसे पावै । दृष्ट अदृष्ट उभय फलदायक, सो पूजा नहि भावै ॥ ले पार्षाण मूर्ति करसे गठि, बहुविधि रूप बनावै । विष्णु शंकर सूर्य गणपती, जो कुछ मनमें आवै ॥ दधि घृत पय मधु ले प्रमाणसे, तामें खांड मिलावै । यहि विधिसे करि पश्चामृत तेहि, मूरतिपर ढरकावै । पुनि ले विमल वारि सुरसरिको, शुद्ध स्नान करावै । धोय पोछि चन्दन लगायकै, पटें भूषण पहिरावै ॥ करी प्रतिष्ठा वेदमंत्रसे, तामें प्राण बुलावै । जो वहि मन्त्र सत्य करि मानै, निज पितु क्यों न जिवावै ॥ भोग थार धरि ताके सन्मुख, घण्टा नाद बजावै । भोजन कौन करें बिन चेतन, उलटि आपही खावै ॥ यहि विधि करत करत जड पूजा, आपहु जड बनि जावै । कहै कवीर ज्ञान सतगुरुका, कैसे हृदय समावै ॥ २५ ॥
बनि पिलु (समय ३-३॥ बजे दिन)
विवेकी, सन्त बसैं जेहि देश । ऋद्धि सिद्धि तहँ टहल करत हैं, धरि दासी का वेष ॥ टे० ॥ मन्दैकिनी गोदावरी गंगा, सरस्वति बहत हमेस । धन्य सो ग्रामैं रुचिरें अति पावन, अघ न रहत लवलैसैं ॥ दख दारिद्र दूर सब भागै, नाश होत भव क्लेश । अर्थ
१ पुकारे. २ उत्पन्न होवे. ३ नाश होवे, ४ योजा. ५ विविध प्रकार की तर्कना. ६ पत्थर. ७ दही. ८ मधु, सहद. ९ पवित्र. १० बहव. कपडा. ११ गहना. १२ समृद्धि. १३ जाणिमायिक अष्ट प्रकारकी. १४ मांगोरची गंगा. १५ नगर. १६ सोमावान. १७ किञ्चित्.