भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१०८)

कवीरपंथी—

अन्ता ॥ अछेदं अभेदं अकोहं अमोहं। गुणं ज्ञान गेहं अदेहं अद्रोहं ॥ कृपा लोचनं मोचनं मृत्यु पीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥५॥

क्षरं पार पुरुषोत्तमं अक्षरादिं। अलेखं अभेदं निरच्छरं अनादिं ॥ गहंतं महाव्याल कालं करालं। दहंतं भवं संभवं दुःखजालं ॥ नलेशं कलेशं न माया समीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥ ६ ॥

गुणानन्तधामं निकासं अयोनी। अविद्या परम हे क्षमा हेत छोनी ॥ उपायं पुनःपोष पालं कृपालं। दहादौर्महा भैरवी भैरु- कालं ॥ धरा धारघै धर्मधी ध्यानधीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ७

कृती सुकृति सुकृतो चित्त चीते। प्रभा ज्ञान गम्यं पदाम्भोज प्रीते। कवीराष्टकं ये पठंते प्रभातं। भने भूरिभै भर्म कर्म निपातं ॥ लहे लाभ हिरम्बरं रम्य चीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥८॥

कवीर भानु उदय-सर्वैया

रवि आगम साख समागमको; घरियाल पुकार लगी जब लोही। सुनि शब्द निसान पिसान भये, सठ सेन सहायक दुर्जन द्रोही ॥ नरनाग सुरासुर सीस नवै, उदयाचल पै रवि मंडल सोही। धन्य धन्य प्रभाकर धाम प्रभा, खलबाम बहे तुम्हरो मुख जोही ॥ १ ॥

कुलकंटक वक्त्र बिलाय गये; रथ चक्र लखे रवि चक्रवर्तीके। गुनज्ञान गँभीर हिये सरसे, दरसे परसे प्रिय प्राणपतीके। बडभाग सुभाग सुभागिनको, सुख साज समाज है आज सतीके। विरहातप ताप संतापविते, भ्रम भये चलिगये गलि ज्ञान गतीके ॥ २ ॥

यह रैन भयँकर घोर महा, तब तेज दहा तिहुँ लोकन स्वामी। अब सूझि परे कछु बूझि परे, सत्त नाम चरित्र पवित्र प्रनामी ॥

१ नोट-भुजंगप्रयात छन्द चार भागका होता है यथा—पद्यों में प्रभृतं यह हाथ जोरो। फिर बायुते न कबो बूझि मोरी। भुजंग प्रयातोपमा चित्त जाको। जरं ना कदा मूलिके संग ताको। छन्दप्रभाकर।