कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(१०९)
दुख दायक चोर चकोर चकार सब भाग अभाग कुमारग गामी । हग दृष्टि खरी गुणज्ञान भरी, जगसीस करी तम पीस नमामी ॥३॥
सत्य कबीरको सत्य और मन राजाको सूत ! दोनोंका युद्ध वर्णन ।
पटि सत्य अगार नगार दियो, निज सत्य व शुद्ध स्वरूप समेते । छवि पुञ्ज महा सुख पुञ्ज भले, धन धर्म रु धीरज ध्यान सचेते ॥ मल सोधन राग विराग जिन्हैं, नहिं क्रोध कषाय जहाँ लगि पैते । सुखदायक है सब लायक है, जन शोक सहायक दर्शन देते ॥
असि मूठले झूठ चठै तिहिपै, जिनके हियमें सतते दुख भारी । एक ठौर कियो सजि सेन सबै, निज दौर जहाँ लगि ठानत रारी ॥ तिहि संग अनी भल ढंग बनी, तब अग्र चला समुहे ललकारी । दलदम्भ ठटे खल है निपटे, गहि मान मलान जुरे सब छारी ॥६॥
रनशूर महाबल शूर सबै, नहिं नूर कहूँ लखिये तन कारे । सब अछन वछन श्याम सजे, चलिये सब सत्यके युद्ध विचारे ॥ अभिमानके कुञ्जर झूठ चढ़ा, निज फौज पराक्रम पुञ्ज सुधारे । मारनको सबही, अपनो अपनो बल वीर्य सकारे ॥ ६ ॥
तहैं सत्य अकेल सहाय नहीं, रिपु भै नहिं सो मनमें कछु मानी । इतने मह झूठ निशान बजो, अरु श्याम ध्वजा तहवाँ लहरानी ॥ ध्वज टूटि गयो रिपु फूटि गयो, सत ताक पताक दिशा हग तानी । तिहि तेज प्रतापहुते बहुते, सब भागि चले विधुनी विहरानी ॥७॥
कोई शूर सपूत बड़ो तिनमें, जो गुमान गहे पग डारत आगे । विनमें सबही निज मान गही, नहिं तेज सही मरिगे कछु भागे ॥ दहिगो सब बाहन राहनमें, रहिगो यक झूठ अजौं जिय जागे । जग पैलि बढाय चढाय कियो, सत सन्मुख होकर युद्ध जो मांगे ॥८॥
जिमि श्याम घटा रन आनि डटा, निज मत्त मतंग चलावत सोई । अति रूप भयानक धावन कै, जग जीव डरावन जालिम जोई ॥