कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(११०)
कवीरपंथो—
ज्योहि ज्यों सत् समीप गयो, बलछीन भयो सब शस्त्रन खोई । नियरान गयन्दहि प्राण तबै जरि, छार भयो तब खाक मिलोई ॥१॥
वैराग विवेक विचार बढे, अरु ज्ञान चढे है निशान बजाई । चारिहु युत्थप संग अनी, चतुरंग धनी दम संयम ताई ॥ शुचि साधन मोन अरु दान दया, है आचार तपोधन कौन गनाई । दल साजिकै सत्य कवीर चढे; रिपु धीर कहा जो सके समुहाई ॥१०॥
दुसरी दिशिते मनराव अनी, नहिं जात गनी अगनी गहि धाई । तह काम रु कोध है मोह महा, अरु लोभ रहा सरदार लडाई ॥ निरदाय असत् अशौच लिये, सब आय सहाय भये यक ठाई । चवगान समाज जुरे दल दो, घमसान परे तहैं लोह चलाई ॥११॥
दिननायक सायक छूटि चले, महि खेसघनी ध्वजनी ध्वज टूटे । तमके दमके बुति दामिनि ज्यों, दसहूँ दिशि घेरि लियो खल फूटे ॥ करको सर कोटि दिवाकरको, सब देश विदेशनमें जब टूटे । नहिं शूर कोई भजि दूर गये, रिपुसेन सहाय सबे गहि कूटे ॥१२॥
हरि श्वेत ध्वजा फहरान लगे, घहरान लगे हैं अनाहत ढंका । यम युत्थ अपार खभार परे, जितही तितही सब सोच संसंका ॥ बल वीर कवीर के सन्मुख हो, नहिं धीर धरे तिरछा अरु बंका । गण तीर शरीर समाय गये, छनमांह भये सब कालको फंका ॥१३॥
मद मार महामतवार चले, समुहाय बजावत ढोल दमामा । गहि शस्त्र अनेक चमू चमकी, पहिरे गहिरे रंग जामिन जामा ॥ दुरबुद्धि दगा छल छिद्र पगा तहैं; कपट अखंड सगा सठ तामा । भय भयं भयावन भूत चले, बहु दूत कपूत रले अघधामा ॥१४॥
क्रमही क्रम ज्यों नियराय चले सियराय चले अगिले भट भोरे ॥ हरुए हरुए बिचले बिचले, पछिले पछिपलि रहे कुछु थोरे ॥ थिरता पद हानि डटे कितने, अभिमान ते बात सटे बरजोरे । जब पेलि अगार लगार चले, गहि गूजसों सुज हडावरि फोरे ॥१५॥