कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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शर शब्द सगसर छूटि चले, यहि ओरते शत्रुके सेनमें छाई। सब घायल भूमि परे छनमें, आरिचंड प्रचंड अनी विचलाई॥ गहि ज्ञानके गोलन सदैं कियो, महि मर्द गनी महि गर्द मिलाई। रनमें मन राडको हाड गडे, वैराग विवेककी टेक रहाई ॥१६॥
बलवान विराग रु ज्ञान भये, रिषु सेन दिये सबही विचलाई। जय शंख निशान रु घंट बजे, शहनाइ अनाहत केरि सुहाई ॥ चहुँओरते घेरि लियो गलियो, निज बन्धन बाँधि लियो मनराई। गढमें पहरा बिठलाय दियो, अरु नग्र फिरी सतनाम दुहाई ॥१७॥
प्रभु दीन प्रकाश जो उग्रनको, सोई सूषच छुद्र चमार चंडारो। नहि तारत बार खला वृखला, अघओघ नसाय कसाय उबारो ॥ सम भाव डुराव नहीं जिनके, यवनादिकहु सुखधाम सिधारो। कर्म नासहि देव सरी सभके, खल पावन सत्तहैं नाम तुमारो ॥१८॥
प्रभु देखि सतोषुन व्यापि गयो, कलिमें भूत है कृतकी वृत्त बाना। महि भीतरको डर गाड घने, तम घोर न उल्ल सभी उस थाना ॥ निजु सेन समेत समाय तहाँ, तुमरे डरते कलि जाय छिपाना। चकचोंधरिचोचमगादरके, प्रभुनिन्दक ताहि न काहि ठिकाना ॥ १९ ॥
रथ धर्म अरूढ अगार बढे, गहि ज्ञानन गूढ निसा मदहारी। मुख सप्त तुरङ्ग सुरङ्ग सजे, प्रभु अंश प्रशंस पुरान पुकारी ॥ सत नाम सही रथवाहक तौ, रथ चक्र जो वेद स्वसम्म उचारी। गुरुचार सोई गुनचार वने, तप तेज अभै कर दुष्ट संहारी ॥२०॥
कवित ।
जम ज्वाल जरत जगतपति जोहि जग, जीवन जियावत जुडाव जगजरनी। भाग भल भक्त भगवन्त भजु भोर भोर, भंजत भरम भय भीर भय भरनी। वारिनिधि वोहित वदव बुध