भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(११२)

कबीरपंथी—

बेदबर, वेद वरदानन बखान बर बरनी । कलि कलमख कुल कंटक कटक कोटि; कीर्तन कवीर करतारकर करनी ॥

कबीर मानुप्रकाशपृष्ठ २४१.

इति कबीर शानु उदय सर्वथा और कवित ।

मध्याह्न संध्या-साखी ।

साहब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय । शरण आय यम सो बचे, आवागमन न होय ॥ १ ॥ दया करन अवगुण हरण तारण तरण उदार । अशरण शरण, वन्दू चरण तुम विनु नहिं निस्तार ॥ २ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके हाथ । त्रसित गह्यो साहिब शरण, भव भय हारि सनाथ ॥ ३ ॥ प्रभु सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान । लोह कनक पारस करे, साहब शरण समान ॥ ४ ॥ वन्दों चरण सब दुखहरन, प्रभु प्रसाद दुख धूरि । दया करी सब दुखहरी, संसृत शूल भो दूरि ॥ ५ ॥ बहे बहाये जात थे, भौसागरके माँहि । दयाकरी पखाँय सब, शरण आय गहि बाँह ॥ ६ ॥ संतत अभय गुरुके चरण, सदा परख प्रकाश । समन सवे भवजालतम, राम रहस सुख वास ॥ ७ ॥ सर्वोपरि गुरुके चरण, जो हारी भवखेद । परम उदार सागर दया, थाह न पावे वेद ॥ ८ ॥ वारों तन मन धन सबे, पद परखावन हार । गुण अनन्त जो पचिमरे, विनु गुरु नहिं निरतार ॥ ९ ॥ संधि परखावे जीवकी, काटे यमको फन्द । साहब दीन दयाल सो, संशय खंडे द्रन्द ॥ १० ॥ द्रन्दज सत्य असत्यको, जहाँ नहीं कुछ लेश । सो प्रकाशक गुरु परख है, मेटत सकल कलेश ॥ ११ ॥ जाहि दया गुरु परखलहि, मेटे सब भव जाल । रक्षक बन्दी छोर सो, साहब दीन दयाल ॥ १२ ॥ भेष अमद्गल नष्ट गुण जेते त्रयविधि फांस । अदल चलाई कालपर, सो त्रिदोषहिं नाश ॥ १३ ॥ अदल चलाई सत्यका, साहब बन्दी छोर ।