कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पारख छोरे जीवको, यमका हाथ मरोर ॥ १४ ॥ दया दयाल पारखलहि, सुधरे सब भ्रमजाल । अदल चले तब सत्यका, शिर धुनि रोवे काल ॥ १५ ॥ प्रथम शब्द सुधारिके, टारे त्रयविधि जाल । झायीं मेटत संधिको, ऐसो शरण दयाल ॥१६॥ पारख गुरु सुख बास है; जहाँ न फन्द काल । सो विनु जीव विनाश है, चौरासीके जाल ॥ १७ ॥ जो रहस युत पारखी, साहब साँचा सोय । तरे तारे भव जालसे, काल देखि रहे रोय ॥१८॥ पारख तोड़े भ्रम गढ़, खीजे काल कराल । करि न सके प्रभुता कछु, ऐसो शरण दयाल ॥ १९ ॥ सत्य शरण प्रभु पायते, दूटे मोहक डोर । अभय भक्ति पारख सदा; काल न लागे चोर ॥२०॥ प्रभुकी शरण सहाय विन, कैसे होय उबार । अधमकाल आसे सबे, अपनी जाल पसार ॥ २१ ॥ परवश जियरा कालके, दुख पावे संसार । बिनु पारख भटकत फिरे, थके विचार विचार ॥२२॥ चारि वेद षष्ठ अंससो, प्रगट भये जग आय । अर्थ विचारत जिव थके, झगरा बहुत मंचाय ॥२३॥ षट षट षटकी जानहीं, ते न परै भव फंद । गुरु पारख प्रतापसो, सदा रहे आनन्द ॥२४॥ महासागर संसार है, जाके संशय धार । सुर नर मुनि सब बहि गये, पारखि उतरे पार ॥२५॥ पारख अचल अखंड है, ताहि परे नहिं और । विनु तेहि भटकि जग रहे, जहाँ नहीं तिथि ठौर ॥ २६ ॥ राम रहस साहब शरण, अभय अशंक उदोत । आवागमनकी गम नहीं, भोर साँझ नहिं होत ॥ २७ ॥ नाशक के सब रूप हैं, रहे तेहि मध्य समाय । कष्ट विविधि विधि पावते, पारखलीन छुड़ाय ॥ २८ ॥ प्रभु शरणागत परख दृढ़, सत्य- लोक प्रणाम । सन्तत जीव बिलास है, दूटा काल गुमान ॥२९॥ जो जीव परख बिलासमें, लहे सदा सुख चैन । तिनके त्रास न