कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(११४)
कवीरपंथी-
कालके, और कहेको बैन ॥ ३० ॥ परख विलासी जीवजे, धनी सोई संसार । और सबे निर्धन रहे, यम के हाथ खुबार ॥३१॥ संतत सुख है परखमें, साधन यतन विनास । भूलि भटक मति जाहु जिव, विविध कर्मके फाँस ॥३२॥ धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार । तेई बन्दी छोर हैं, तारणतरण उदार ॥३३॥
अथ माध्याह्न दिनकी स्तुति
कवीरभानु प्रकाश पृष्ठ ५२८ (नराच छन्द)
प्रभुं परे पारायणं समस्त ज्ञानसागरं । विश्वंभरं धराधरं कृपा- करं उजागरं ॥ कलिकलंक नाशनं कवीर नाम नागरं । कृतान्त तीख त्रासनं कृपानिधे नमोस्तुते ॥ १ ॥
कृपा सुवारि तोषकं सुसन्तशालि पालकं । कृपा सुभक्ति- पोषकं पराग पापघालकं ॥ समस्तशोकशोषकं दरिद्रदोषदालकं । सुकृत सर्व सार कृत कारकं नमोस्तुते ॥ २ ॥
निजं निरीह निर्गुणं अनन्तलोकनायकं । अनादिदेवपायकं ॥ करालकालदालकं तौ संकटं सहायकं । निरंजनं नारायणं नरो- त्तमं नमोस्तुते ॥ ३ ॥
गणेश शेष शारदं गुणानि नित्यगावनं । अजादि देव नारदं सुकृत नाम ध्यावनं ॥ शरीरभै नशावनं कवीर जक्तपावनं । सुभक्त चित्तभावनं सोहावनं नमोस्तुते ॥ ४ ॥
चकोर चित्त चौरकं चचारु चन्द शोभितं । सुनिन्द पादपं- कजं अलिन्द सन्त लोभितं ॥ विज्ञाननैन जोहिनं सुकण्ठ नाम पोहितं । निचिन्त निर्विकल्पकं सकल्पकं नमोस्तुते ॥ ५ ॥
क्रमं वनं सहारणं सुबारणं कुमारकं । विनीति प्रीति पालनं सुबुद्धि निद्धिधारकं । दुःख तरु कुठारकं भव भयविदारकं ॥ कवीर नाम तारकं विहारकं नमोस्तुते ॥ ६ ॥