कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
राजसं वकार विष्णु सात्त्विकं ॥ रकार शम्भु तामसं उपाय पोष धातकं । समस्त दोष पातकं निपातकं नमोस्तुते ॥ १६ ॥
कवीर पाद पंकजं सनेम प्रेम ध्यायकं । गुणानि नाम कीर्तनं सुधाम काम दायकं ॥ विराग त्याग लभ्यते हदं पदं गहायकं। तरंत तारनं भयं विदारनं नमोस्तुते ॥ १६ ॥
अथ मध्याह्न-शबैया ।
कवीर ज्ञानप्रकाश पृष्ठ ५३०.
तन भंग पतंग उतंग भये, बट पार जुबारकी खोजन पाईं । बरते नव खण्डमें तेज महा, ब्रह्माण्डमें आनि रह्यो ठहराईं ॥ पहरी अरु स्वान सुखी सबही, पथिको निर्भय श्रम पन्थ बिहाईं । तुमरे परताप सन्ताप गयो, मम दंड प्रणाम तुम्हें रविराईं ॥ १ ॥
गिरि कन्दर अन्दर दुष्ट दुरे, रवि तेजप्रवाह सभी तम भंजे । यम काल सकाल विहाल पडे, नहि आय कोई धर्मराजके पंजे ॥ हग दृष्टि प्रचंड ते अंड सुझे, जन रञ्जन पायनके रज अंजे । गुरु नाम चरित्र पवित्र लखे, खल चोर निशान निसाचर गंजे ॥ २ ॥
तम वंश विध्वंस न संशकहूँ, दशाहूँ दिशि हंस सभा सरसाईं । मृत्यु नाथ अनाथ बेहाथ भये, बल वीरज धीरज तेज गवाईं ॥ रमि राम चले पर धाम सबे, चहुँ ओर फिरी सत नाम दुहाईं । श्रम भंड करे न विहंडकने, यम दंडक दंडन मारि भजाईं ॥ ३ ॥
नहि खोट है ओट उलूक लुके, सुचि सेत सती विरती वर गाजे । सब झार कवीर कवीर कहै, छल छिद्रपै श्रम संशय भाजे ॥ तिहुँ काल है सत्य कवीर सुखी, गुण गाव सभी सुखको सज साजे । यह बारह पंथ कला रविको, प्रभु पूरण ब्रह्म हो न्योम विराजे ॥ ४ ॥
हिमजार जुबार जुबार धने, निज शृङ्ग शिलापै किला घर छाईं । बड वृद्धि भई खगरे वगरे, फिर स्वर्ग दिशा शिर ऊंच उठाईं ॥