कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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हरषे नहि धर्म रखे करखे, दम संयम भक्ति कृषी दुख दाई । जब सूज तेज तपै तिनपै, तेहि बूजते धरि धूज मिलाई ॥ ५ ॥
कहु सूजमुखी यक पाय खडा, चितवै चित चाहते सील नवावे । जेहि प्रीति अभंग पतंग पिया, पदनीरजको धरि धीरज ध्यावे ॥ अम भंजकहु वन कंज खिले, दिन भूप स्वरूप अनूप दिखावे । गिरि निश्चल आसन ध्यान धरे, करुणा प्रभुलाल अमोलक पावे ॥ ६ ॥
प्रभु तीक्ष्ण तेज तपै महिपै, बन लोल लवारन आगिते पूरी । नव खण्डमें पवन प्रचंड चले, भरिमारन मूठिन ता दग धूरी । तम ग्रीषम झार अपार तपै, प्रभुनाम जपै जनभक्त अंकूरी । दिन- नाथ दयाल भये तबहीं, जनको सबही दुख कीनेहु दूरी ॥ ७ ॥ गुण खान पियाकी हिया हरषा, करि तोष तिया वर्षा झरि लायो । धरती भई गर्भवती तबही चहुँ खानिके जिन्सको वंश उपायो ॥ तप कीन महीननलों भलसों, अबतो सबको फल पूरण पायो । बडि बृद्धि भई पुत्र पौत्रनको, बहु रंगमें स्थावर जंगम जायो ॥ ८ ॥
फुलबागन फूल अनन्त फुले, धनवंत यथा यशवंत सुहाई । जनु सम्पति पाय सती गिरही, श्रद्धा युत द्विज साधु बुलाई ॥ कहु वेल चमेलिन फैलि रही, हरि भक्तनकी जिमि कीरति छाई । फल पूरित शाख नवे कितहु, मन अर्थ लहै जो गहे नमराई ॥ ९ ॥
लहरी तृणपात भरी धरती, तपसिद्ध तपी ऋधि ज्ञान ज्यों पूरे । कहु ऊपर घास न फूस रहे, गम्म गुन्न विना हिय सून्य ज्यों कूरे ॥ जल कीच है धूरि न धूरि कहुँ, सतसंगतिसो जिमि हुर्जन दूरे । पर त्यागलो पंजन खंजनहु, अम भंजन दरशते ज्ञान ज्यों फूरे ॥ १० ॥