कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
कहुँ भूख सँहारक ऊँख भई, पर हेत सहे दुख जो अधिका। कहुँ स्वेत कपास विकास कियो । पर छिद्र छुपावन जो तन धारा ॥ कहुँ अन्न रु साग व पात उगे, तरकारि वनस्पति चौदह भार। सुख साज सभी सब घेर मही, यह केवल भानु प्रताप तुम्हारा ॥११॥
कक आदिपिता कथि वादि निता, ख ख सुन्न निरंजन ताहि ते हेरा ॥ खखते प्रगट भये खंड सबै, खख ज्योति अखंड दिशों दिशि हेरा ॥ वसुदेव बकार विश्वभ्रम है, बर बीज चराचर चीजचितेश। रचनाके भंडारको धारकसो, धर ओष्ठन द्वारके ऊपर डेरा ॥१२॥
भवसागर जालको काल बने, ररकार बडे सरकार कहायो । तिन खोलि केवाडि लियो, बितको तेहि ठाहर ते गहि बाहर आयो ॥ तप घोर करे यक पाय खडे, भव बारिध जारिध राज लिखायो । तरनी-कक-है कडि हार-बबा रर-दंड तिहुँ जगको उधरायो ॥ १३ ॥
ररकार धरे शिर बिन्दु जबै, इभि नाद रु बिंद है जिन्द यती सो । सो कृशान रु भान ससांक भये, नहि पावत पार अपार गतीसो ॥ ररविन्दके बीच अकारछपै, कहँ रामको नाम विरंच मतीसो । रररेफ गफेलमै भेद सही, नहीं जात कही वह बात रती सो ॥ १४ ॥
रर पूर्ण ब्रह्म निरंजन है, वह भाँतिके भाजन भञ्जन कीन्हों। बब बीज विना कछु चीज नहीं, दोउ एक भये रचना चित दीनों ॥ कक कायक कर्म किया सबही, फबही तबही जबही मिले तीनों । ककही बबही ररही ररही, सरही सब काम कवीर जो चीन्हो ॥ १५ ॥
कक कंटपै बैठिके चेतनदे, जिव संठ उदार सुधारत वानी । बब अग्र गयो जहँ नग्र नयो, सरहद पै लह जमा सब आनी ॥