कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(११९)
ररवीर बली तब पील चली, कर क्रोध विरुद्ध हो युद्ध जो ठानी। ककहू बबहू दवही रहिगै, ररको धरको थरको जगजानी ॥१६॥
कक केवल ब्रह्म है देवलमें, बबदीन कपाट सुपाट हुवारी। तहँ जाय जो कोय सो होय अभय, दरसै दरपै परब्रह्म पुजारी ॥ कोई जान नहीं भ्रम भान नहीं, शक खोलकी टोल लगी तहँ तारी ॥ रर रारकरी पट टार धरी, गहि भार भरी भव जार सँवारी ॥१७॥
करुणामय कंत कवीर कहो, कवि कोविद को कुल कर्म कटैगौ। मन मोहन भीत सुनीन्द्र मिली, मद मोह मनोज सु मौज मिलैगो ॥ सत सुकृत सत्यस्वरूप सदा, सतनाम सँभाल सुधाम सटैगो। घन घोर घटा घट घाट गिरे, घटि घालत घूमर घेर घटैगो ॥ १८ ॥
रस पाय सुधा यस गाय बुधा, मम लेखनि पै सुर वृक्षकी शाखा। सुखते यहि अमृत धार खवे, न मरे न परे भव जो सब चाखा ॥ न लगे कहू भूख पियूष पिये, न हिये कहू और रही अभिलाषा। सब स्वारथको परमारथको, फल चार पदारथ हाथ न राखा ॥ १९ ॥
युग आदिहु मध्यमें अन्त विषै कलिहू कृतमें अरु द्वापर त्रेता। गुरु देव दयालहि चीन्हत जो, चरनों चित्त लाइके होत सचेता ॥ तिन सार लहा पुनि हार कहा, भवपार गये परिवार समेता। कर कोरिके जोटि प्रणाम तिन्है, तिहुँ काल जो, जीवन को सुधि लेता ॥ २० ॥
छन्द मधुकर
सर्कार बडा। सर्कार बडा। विश्वास करो हो आन खडा ॥ वैपार कडा वैपार कडा। जो तौल सबै गहि ज्ञान घडा ॥ जो डाल दियो सो डाल महा। कत्ताल समय पत्ताल गहा ॥ जय जक्त पिता जगदीश यजो। कब्बीर कब्बीर कब्बीर भजो ॥ ११ ॥