भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१२०)

कवीरपंथी—

साखी ।

हरि गुरु पीर कवीर लख, अलख पुरुष रुख जोय । हजरतको पहिचान जब, बजरत काल न कोय ॥ १ ॥

इति श्रीमध्याह्न स्तुति ॥

स्तोत्र ।

(छोटी एकोत्तरी नित्य पाठकी)

सतगुरु शरणं पंकज चरणं मनवच कर्म सदा गहियं । जग मरण भयं निवारणं अखिलेश्वर अभय कहियं ॥ भेषज नाम नित प्रति धामं महा काल दारुण गहियं । दीनदयालं जन प्रतिपालं भवसागर तारण कहियं ॥ १ ॥

भव भय भञ्जन अन्तक गंजन सन्त चकार मयंकं लहियं । अनहद नादं दहृत विषादं सोहं हंसा निश्चलयं ॥ अजपा जापं हरत सन्तापं आदि नाम जपिये अभियं । सहज समाधं हरत विषादं दयावन्तं सुकृत चहियं ॥ २ ॥

करुणा आदं नाम अनादं मोहित सुनि गेहित वियं । परमा- नन्दं सचिदानंदं सत्यलोक हठरोहनियं ॥ दीननबन्धुं करुणा- सिन्धुं अभयनाम जपिये अभयं । कलिकाल करालं फांसी व्यालं सत्यनाम निश्चय जपियं ॥ ३ ॥

स्थिरं ज्ञानं बीजक ध्यानं अक्षयनाम निज अक्षरयं । नाम उजागरपति सुख सागर अक्षय राज नायक कहियं ॥ अपरं पारं नाम है सारं तासु भजन भौ निस्तरियं । सुखसागर दाता जागृत व्राता अजर अमर सांचो लहियं ॥ ४ ॥

दुर्गजदानी परम अभिमानी धर्मराय शिर मर्दनियं । कलि- काल करालं फांसी व्यालं तासु भजन भौ निस्तरियं ॥ अजर अविगत जान विश्रामं कृपा विशेषं निःअंशनियं । जय जय स्वामी अंतर््यामी ब्राहि ब्राहि करुणानिलयं ॥ ५ ॥