भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(१२२)

कवीरपंथी-

हारे। तारण तरण विगत संभारे॥ मन अनुमान गुमान विनाशक। मोद प्रत्यक्ष दान निज दासक ॥ वेद कुरान बुझाय यथारथ। मन कर्म बचन साधुमें स्वारथ॥ इति शत नाम गुरु गनि आयी। सब वृत्तांत गुरु मुख जो बुझायी ॥ साधु गुरु कबीर गुसाई। बन्दीछोर नाम जपु गाई ॥

स्तोत्रं । (कबीर कृपालं)

(महंत मरजाद दास विरचित)

नमो आदि ब्रह्म अरूपं अनामं । भई आप इच्छा रचे सर्व- धामं ॥ न जानामि कोई करै कौन ख्यालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥१॥ नहीं वेद ब्रह्मा नहीं विष्णु ईशं । नहीं पंचतत्त्वं नहीं ते अहीशं॥ नहीं जोतरूपा न माया करालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥२॥ नहीं देवदेवी न सूर्य प्रकाशं । नहीं चंद्रतारा नहीं कोइ आसं ॥ नतो स्वर्गभूलोक नहीं पतालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥३॥ तहां आप इच्छा महाशब्द गाजं । विदेहं स्वरूपं अनूपं विराजं ॥ भई शब्दते सर्वलोकें विशालं । नमोहं नमाहं कवीरं कृपालं ॥४॥ तहां सच्चिदानंद लोकें प्रकाशं । सदा सर्वदा हंस करते विलासं ॥ तहां आपते आप प्रगटे सुकालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥५॥ भयो तेजरूपं सबै विश्व कांपो । कवीरं कवीरं सबै सृष्टि जापो ॥ सुनी दीनबानी भये है दयालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥६॥ तबै नाथ नररूप अवनी सिधारे । घरे कालके फैल तेते उबारे ॥ महादीनदासै सु करते निहालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥७॥ करै कौन तेरी प्रशंसा सुबाना । थके विष्णु ब्रह्मा महेशो भवानी ॥ थके शेष गणनाथ बाणीवि- शालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥८॥ न काहू कहूं नाथ तुव पार पायो । अनादे अगम्मे निगम्मे बतायो ॥ तुही निर्गुणं सर्गुणं रूपजालं । नमोहं नमोहं कवीरं कृपालं ॥९॥ तुही कोटको-