कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
कव्वीर० ॥२६॥ बोधे दोई दीन तहां कीन्ह ऐसो । समुझाय दर- साय जिहि जौन जैसो । तजि देह दोहु और हथियार गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२७॥ दोहु ओर क्रोधा सु जोधा बडे हैं । अपने जु अपने सु प्रनपे अडे हैं ॥ तक तास नियरान यह बानगहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२८॥ देखो उघारी उहां है वो नाहीं । केहि काज लरते सु मरते वृथाही ॥ तब आय दोउ दीन देखा न अहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२९॥ स्थूल घर फूल अघ्रान भारी हे ब्रह्म ! हे पीर ! रटना पुकारी ॥ सुनी दीन बानी सु तिहि दर्श बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३०॥ पुनि एक औरि सुनो रे सुनाऊं । लखि स्वामि ऐसो सु दिन रेन माऊं ॥ तत्ताव जीवा प्रण ऐसो गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३१॥ सूखो इतो एक लकडा पुरानो । हरिआय जिहि चरण चरनोद जानो ॥ गाडो है सो आय अगनाय बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३२॥ जुरि आय बहुभेष दग देख लीजे । पानी सो छानी औ गुरुजान कीजे ॥....साधू सो है सूर प्रण पूर गहुरे कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥ ३३ ॥ न्यारे सु न्यारे ले चरना पखारे । जिहिभांत जिहरीत करप्रीत ठारे ॥ हरियान नाही सो उरदाह दुहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३४॥ तब जानजन प्रीत प्रण पूर आये। उर दाह लागी सो छिनमें बुझाये ॥ लै चरण चरनोद मनमोद बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३५॥ डारो है कर प्रीति परतीति आयी । हरियान निरजीव सरजीव भायी ॥ दोऊ बन्धु निरद्वंद सरना सु गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥ ३६ ॥ सो टूट ना आय जी जगत केरे । जर भक्त अंकूर जमराज पेरे ॥ सो आप गुरुरूप निजरूप बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३७॥ चरना दह मृत्यु समरत्थ्य करो । करुनाशकी कोर फिर आप हेरो ॥