कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
अनारी गवॉर ॥ ९ ॥ साहब दयावंत अविगत अपार । सोऽहं सोऽहं भँवर गुँजार ॥ दुनिया विलोमान होती हनोज । कीजो बे यारो परम हंस खोज ॥ १० ॥ फना है फना है फना है लगार । माटी मिलेगा जो करता सिगॉर ॥ हस्ती रु घोडे रु जोडा जहान । फना दीन दुनिया जमीं आसमान ॥ ११ ॥ राजा न रैयत रहेगा न कोय । रहेगा चिदानंद उपजा न सोय ॥ भाई भतीजे रु जोरू जमाल । देखैंगे लडके जो होगा हवाल ॥ १२ ॥ दादीरू फूफी बहिन रोवैंगी रुह । जम आनि पकड़ेगा जब दू बटूह ॥ मौसी रु मामा अलामा जहान । शुकदेको पूछो जो विरक्त परवान ॥ १३ ॥ हजार बार तोबा जो खैंचे हदीस । कहो कौन मेटेगा जमकी कशीस ॥ काफिर करद बाँधि खाते बकरीद । जमकी । तलब कैसे होगी रसीद ॥ १४ ॥ सुरगी रु बकरी टँढा रु ढोर । खूनी भखैहैं शरअ के जो चोर ॥ चाकर चरवाहा रु देखै खवास । जब आन बीतैंगी जमकी त्रास ॥ १५ ॥ करियो बे यारो कुछ चलनेका मूल । दरगह न पहुँचे नबी ओ रमूल ॥ मुहम्मद नबीकूँ न पाया है राह । अर्श पंथ बाँका है अगमो अगाह ॥ १६ ॥ शरेकी शरीकत तजा है न दीन । उलटा अपूठा परा है जमीन ॥ दोजख विहिशतका जो देखा है अंत । जा बीच जमराय तोडे है दंत ॥ १७ ॥ दोजख विहिशतको देखा जो उनमा न । जा बिच जमराय काटे जुवान ॥ दोजख विहि- शत हैं जो बाँकी उजाड । जा बिच जमराय तोडे है जाड ॥ १८ ॥ करियो बे यारो खजाना खरीद । संग ना चलै देखो दीद बर- दीद ॥ संग ना चलेगा सूरई रु सुमेर । काफ़र कुटन करते घेराहि घेर ॥ १९ ॥ झूठा करम क्रूर काफिर कूँ जान । अह- रनकी चोरी सूरईका जु दान । मूजी मुजावर व पापी प्रेत ।