भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१३५)

सुमका ससुरा न साईसे हेत ॥ २० ॥ सदगुरु चिदानन्द अवि- गत अपार । पाजी खानेजाद तुम्हरे अघार ॥ सतगुरुनका सामां जमैयत जमाल । देखे तमाशः सब कुदरत कमाल ॥ २१ ॥ शीलके सरोवरमें नहाना हमेश । प्रेमपद पारसका दीजे उपदेश॥ बुद्धिका बखतर औ पाखर प्रतीत । सोहं जपमाला भज अवि- गत अतीत ॥ २२ ॥ बुद्धिकी बन्दुक और हठकी दे ढाल । चित्तका चकमक भर दारू दर हाल ॥ पवनका पलीता व गोला गुलजार । दोदलकी खिडकीसे उतरोगे पार ॥ २३ ॥ ज्ञानकी गादी समाधी गलतान । दयाकी हुलीचेपे धरमका निशान ॥ द्वादश दल जीतनको तत्तकी तलवार । अर्ध उर्ध तकिय बिच दुर्जनको मार ॥ २४ ॥ नामकी नवकी कर मनकूँ मलाह । चित्तका चंपु ले सुरतसे चलाह ॥ अर्शमें आसन सिंहासन समोय । उदित भानु चन्द्र ओ कला संख जोय ॥ २५ ॥ तत्त्वका तिलक करले गायत्री लाप । शून्य सिखर गढमें जप अजपा तु जप ॥ अरसठका नहाना त्रिवेणीके तीर । सर्वज्ञ साहब भज कायम कवीर ॥ २६ ॥ मानसरवर दरिया जहाँ चुगते हैं हंस । लगे गैबगोता जहाँ भेटे परमहंस ॥ अछय वृछ अर्श बीच फूला गुल- जार । अर्थ धर्म काम मोक्ष पाये दीदार ॥ २७ ॥ पात पात विष्णु बैठे शिव विरंचि शेष । सतगुरु कुर्बान जाऊं ऐसे उप- देश ॥ सदगुरु चिदानन्द माया न मोह । निर्गुन निरालम्ब जाना है तोह ॥ २८ ॥ कासे कहूँ भेव परवरदिगार । जाना हम जाना है अविगत अपार ॥ अर्श बीच बैठा जो मारे गिलोल । देखो वे यारों कुछ नहीं तोल मोल ॥ २९ ॥ पीताम्बर पटमें हैं सूक्ष्म सा रूप । सुरति नाल चलती है छाया अनुरूप । सत- गुरु आवाजी निवाजीलिलाट । सुनो अर्ज नामा पढनके जो