भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

(१३६)

कवीरपंथी—

घाट ॥ ३० ॥ ब्रह्म तेजताली हमाली हुजूर । अग्रपंथ पाया समाया जहूर ॥ सतगुरु शरीकत हकीकत जवाब । कहो कौन लेगा शरमें हिसाब ॥ ३१ ॥ मौले मिहरवान मालिक सुरारि । हीरा हिरम्बर तुही वारपार ॥ सतगुरु दिगम्बर विश्वम्बर दयाल। पलमें निवाजे जो नजरे निहाल ॥ ३२ ॥ अगम ज्ञान लासा खुलासा जो सैल । पपीली न पहुँचे जो लादे है बैल ॥ गरीब- दास छाना है नीर खीर । कुर्बान कुर्बान कायम कवीर ॥ ३३ ॥

इति अर्जनामा गरीबदासजीका ।

अथ अर्ज नामा ॥ ३ ॥

सतगुरु मिहरवान कीजे करम । गाफिल खुदी हूर दिलका भरम ॥ १ ॥ बहुत रोज बीते मैं तेरी शरण । स्याही गई अब सफेदी बरन ॥ २ ॥ सुझे बहुत अंदेशा किया मैं जो फेल । बदी बहुत कीता ओ नेकी निसेल ॥ ३ ॥ क्या मैं कहूं संगी बुरे सोहबती । किया चाहते ये सुझे बे डुरमती ॥ ४ ॥ आजिज मैं तनहा दुसमन जबर । अर्जी कहूं मैं मेरी लीजे खबर ॥ ५ ॥ सतोगुनकी चौकी व अपनी भगत । इतनी नाथ कीजे सो मेरी मदत ॥ ६ ॥ काया कोट माहिं मैं निशिदिन लहुँ । दुशमनकी लशकरसे नाहीं डरूं ॥ ७ ॥ नवे मोरचा खूब कायम कहूं । देशमें जमैयतसे लगाकर रहूं ॥ ८ ॥ तुम्हारी तबजुहसे दुशमन डरे । हटा अपना माने न मुशिकल करे ॥ ९ ॥ निर्भय हरष होय संशय मिटे । सबे रोज दिल बीच रटना रटे ॥ १० ॥ अन्तः करन प्रेम नैना पगे । जगत कर सब स्वाद फीका लगे ॥ ११ ॥ तुम्हारी विरह अग्रिममें निशिदिन जहूं । चौथी अवस्थाको हासिल कहूं ॥ १२ ॥ मेरी अरज होवे दरगह कबूल । दिलकी सुराद